“तुम आदिवासी हो मगर लगती तो नहीं हो”: शिक्षण संस्थानों में आदिवासी स्त्री संघर्ष

यह तीन भाग श्रृंखला का पहला लेख है। लेखिका नीतिशा आगामी दूसरे भाग में अपने जेएनयू के अनुभवों के बारे

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वर्ल्ड इंडिजेनस डे : आखिर क्यों मना रहे हैं हम देशज भाषाओं का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष?

भाषाएँ हमारे रोज़मर्रा के जीवन में बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाती हैं। हमारी भाषा हमारी सांस्कृतिक विविधता और पारस्परिक संवाद

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बस्तर के युवाओं की भागीदारी से सशक्त होता आदिवासी संघर्ष

एक तरफ पूरी दुनिया में पूंजीवादी व्यवस्थाओं ने अपनी सत्ता जमा के सभी संसाधनों पर कब्जा कर लिया है, वहीं

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जीतराई हाँसदा की गिरफ़्तारी: आखिर क्या है आदिवासियों में गौ-माँस भक्षण की परंपरा?

कोल्हान विश्वविद्यालय के कोपरेटिव कॉलेज जमशेदपुर में कार्यरत जीतराई हाँसदा को साकची, जमशेदपुर पुलिस ने शनिवार (25 मई) को गिरफ्तार

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गाय-राजनीति और आदिवासी समुदाय : हर आदमी अपने ही पड़ोसी से डरा हुआ क्यों है?

मृतक प्रकाश लकड़ा की तस्वीर के पास बैठे उनके भाई पीटर लकड़ा, ग्रामीण बीरबल तिग्गा और जिनका बूढ़ा बैल मर

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लोकसभा चुनाव में डुवार्स तराई के आदिवासी, बागान श्रमिकों, के लिए क्या मुद्देै हैं दांव पर?

मुर्गा लड़ाई में मुर्गों की जिंदगी दाँव पर लगी होती है लेकिन मुर्गों के कल्याण हित की कोई बात नहीं

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भारतीय मूल का प्राकृतिक नववर्ष “पूनल सावरी”: डॉ सूर्या बाली “सूरज धुर्वे”

आइए आज आपको प्राकृतिक नववर्ष की बधाई देते हुए इसके इतिहास और वर्तमान स्वरूप की जानकारी भी दे दें। भारत

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सरनेम में क्या रखा है? उत्तर छतीसगढ़ के आदिवासियों के इतिहास पर चिंतन

जब मुझे पहली बार स्कूल में दाखिला कराया गया, तो मेरे माता-पिता ने मुझे “आकाश कुमार” नाम दिया, यह माध्यमिक शाला

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