लिख तो मैं भी सकता हुं साहब, पर जमानत कराएगा कौन?

असमानता, शोषण की राह लिखुं या दमनकारियों की वाह लिखुं, कल्लुरी की जीत लिखुं या खामोश आदिवासीयों को मृत लिखुं।

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