सुन्हेरसिंह ताराम ने तीन दशक पुरानी पत्रिका “गोंडवाना दर्शन” से बदला कोइतुर-आदिवासी विमर्श

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Usha Kiran Atram

Usha Kiran Atram is a writer, poet from Koitur community. She has written and published many poems and short stories in Marathi, Gondi, and Hindi. She is also an editor of 'Gondwana Darshan' magazine.

उषा किरण आत्राम कोइतूर समुदाय की एक लेखिका, कवि हैं। उन्होंने मराठी, गोंडी और हिंदी में कई कविताएँ और लघु कहानियाँ लिखी और प्रकाशित की हैं। वह 'गोंडवाना दर्शन' पत्रिका की संपादक भी हैं।

सन 1916, कोईतूर सामाजिक आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण दौर की शुरुवात थी, जिसमें कोईतूर समाज के बुद्धिजीवियों द्वारा गोंडवाना महासभा का गठन किया गया. इसके साथ ही सात राज्यों में फैले कोईतूर समाज में बौद्धिक विमर्श की संयोजित शुरुवात हुई, जिसने समाज को संगठित करने में भी अहम् भूमिका निभाई. 1920-30 के दशकों में शुरू गोंडी भाषा पर प्रकाशित साहित्य के साथ यह कारवां निरंतर आगे बढ़ता रहा. स्वतंत्रता के बाद, एक अलग गोंडवाना राज्य की मांग उठी लेकिन 1956 की राज्य पुनर्गठन समिति द्वारा दरकिनार कर दिया गया. आज़ादी के बाद बौद्धिक विमर्श दिशा में 1980 के दशक में एक ऐतिहासिक बदलाव आया, जब 1986 में सुन्हेरसिंह ताराम ने “गोंडवाना दर्शन” हिंदी पत्रिका की शुरुवात की और पूरे 32 साल तक लगातार जारी रखी. 1992 में, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के गठन के साथ यह आंदोलन चरम पर था और आज का गोंड-कोईतुर आंदोलन निश्चित रूप से इसका एक प्रतिबिंब है। इस तरह गोंडवाना दर्शन की कहानी ताराम के जीवन संघर्ष से शुरू होती है.

“मैं समाज का आदमी हूं. घर-बार और धन-दौलत किस लिए? हमारा धन समाज के जुडे़ हुए लोग हैं. मेरे खाते में पैसे नहीं. लेकिन मित्र, परिवार और समाज के इतने लोग जुड़े हैं. भले ही पैसे नहीं जमा कर सका, लेकिन आदमी की जमा-पूंजी मेरे हृदय के खाते में बहुत जमा है. मेरे लिए यही धन और संपत्ति है.”

4 अप्रैल, 1942 को मध्य प्रदेश के ग्राम खजरा गढ़ी के एक कोईतूर-गोंड किसान परिवार में जन्मे सुन्हेरसिंह ताराम के इन शब्दों में उनके जीवन दर्शन की झलक साफ़ दिखती है. साहित्य सेवा ताराम का मुख्य उद्देश था और उन्हें पढ़ने का बचपन से ही बहुत शौक था. “मैं खूब किताबें पढ़ूंगा, लिखूंगा, अफ़सर बनूंगा, और दुनिया का भ्रमण करूंगा.” ऐसा उनका बचपन का सपना था. लेकिन, उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी. मां-बाप और परिवार वालों ने पढ़ने के लिए सख्त मनाही की. इतना ही नहीं, उनके हाथ-पांव बांधकर “स्कूल का नाम नहीं लेना, गाय चराना, जंगल जाना, लकड़ी ढोना, यही तेरा काम है!” ऐसी ताकीद बचपन में दी गई थी.

कविता कहानियां और वैचारीक लेखन करने वाले ताराम विद्या विभुषीत और गहरे विचार के धनी थे. उन्होने अभी तक 400 सम्पादकीय और 100 के उपर विविध विषय पर आलेख लिखे हैं.

ताराम अपने जीवन के बारे में लिखते, “मैं पढ़ने के लिये घर वालों से झगड़ता रहा. सातवीं क्लास में पहले नंबर से पास होकर घर से भाग गया. बाहर काम करने लगा. बगीचे मेें माली के साथ काम करता था. कपड़े प्रेस करता था. एक रूपया मजुरी मिलती थी. मजदूरी करता, और बच्चों के ट्युशन लेता था. मजदूरी के पैसे से किताब काॅपी लेता था. ऐसे करते-करते मैं मॅट्रीक फर्स्ट क्लास में पास हो गया. बाद में पिताजी ने पढ़ने के लिये विरोध किया लेकिन मैं पढ़ने गया…कभी होस्टल में कभी पांच रूपया खोली लेकर, कभी भूखा, कभी पेट भर खाकर मैं पढ़ता रहा. ग्रेजुएट हो गया. एक लायब्ररी में चैकीदारी करता क्योंकि पढने के लिये किताबें मिलती थी. गर्मी की छुट्टी में और दीवाली की छुट्टी में चचेरे भाई घर जाते थे. खुशी मना के वापस आते थे. लेकिन मैं छुट्टी में ढिमर समाज के लोगों के साथ के साथ आलु भट्टे लगाता था.”

ग्रंथालय में चौकीदारी करके ताराम ने प्रवेश परीक्षा पास की और सरकारी ऑफिसर बन गए. ताराम लिखते हैं, “दस साल नौकरी की, इस बीच शादी हो गयी. लेकिन पत्नी लालची निकली; मेरा घरदार हड़प करके मेरे भाई माँ बहन को चोरी के आरोप में उसने जेल में डाल दिया. मेरे उपर कई आरोप लगा के प्रताड़ित किया. मां बहन को जेल से छुडवाया और उसको तलाक दे दिया. घरदार खेती सब उसने लपेट लिया. मैं बेघर बेसहारा होकर हमेशा के लिये सब घरदार खेती-बाड़ी नाते रिश्ते तोड़ कर ज्ञान की खोज में निकल गया.”

इसके बाद उन्होंने अधिकारी पद से त्याग-पत्र दे दिया और दिल्ली चले गए. वहां पर शोध और पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद पूरे भारत में घूमते रहे. आदिवासियाें की बोली, भाषा, देव-दैवत, पूजा विधि और उनकी सामाजिक व्यवस्था को देखते-समझते रहे. भुमका, गवठीया, जमींदार, समाज-सेवक सबसे मिलते रहे और जानकारी लेते रहे. उसी तरह से गोंडवाना भूभाग पर जो किले, महल, तालाब, देव, गढ़ी, देवस्थान, शिल्पकला, देवमढ़ी, गोटुल आदि देखते और उनके ऊपर अध्ययन करके, चिंतन करके, जानकारी लेते रहे.

उनको घर-बार, जीवन के चैन और सुख की कोई लालसा नहीं थी. इसीलिए, वह परिवार से हमेशा के लिए दूर हो गए थे. गोंडी साहित्य, गोंडी भाषा, गोंडवाना का इतिहास और संस्कृति के साथ ही ताराम अन्य आदिवासी समाज के भाषा, इतिहास और संस्कृति की ओर समर्पित थे. ताराम हमेशा कहते- “अपने समाज का दुःख-दर्द देखकर खोया हुआ इतिहास और सम्मान पाने के लिए भाषा, संस्कृति, इतिहास और साहित्य जिंदा रखना ही मेरा फर्ज है.”

आज़ादी के बाद बौद्धिक विमर्श दिशा में 1980 के दशक में एक ऐतिहासिक बदलाव आया, जब 1986 में सुन्हेरसिंह ताराम ने “गोंडवाना दर्शन” हिंदी पत्रिका की शुरुवात की और पूरे 32 साल तक लगातार जारी रखी.

1980 में मध्य प्रदेश, बालाघाट के रेलवाही गांव में एक सम्मेलन था, जिसमें गोंड समाज के मज़दूर, किसान, बाबू, अफ़सर सभी थे. कारखाने में काम करने वाले आर्टीजन इंजिनीअर भी थे. उसमें गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के संस्थापक हीरा सिंह मरकाम (जो उस समय शिक्षक थे), कल्याण सिंह वरखडे तथा रायगढ, सरगुजा के कई लोग थे. सभा में कई भाषण होने के बाद एक गांव का बुजुर्ग हाथ में लाठी लेकर सभा के बीच से उठा और मंच के पास लाठी टेकते आया. हाथ जोड़कर बोला, “इस सभा में आये हूये सियानमन. मोर बातला सुनो, औ उखरला बतावणं.” यह कहकर बुढा आदमी आगे बोला – “मोला चश्मा दे दो! मोला दर्पण दिखा दो!” वह इस वाक्य को बोलकर किनारे खडा हो गया. कई सुटबूट पहने अधिकारी थे, अपनी कुर्सियों पर बैठकर, उपहास से बोले, “एैनक और दर्पण, दिखवाये.” तब ग्रामीण जोर से ठहाका मारकर हंस पड़ा. “वाह रे गोंड समाज के बुद्धीमान. मैं तो गांव का गंवार गंवइया, मेरे प्रश्न का उत्तर देने को मखोल उठा रहे हैं. मेरे शब्दो को गंभीरता को समझे नहीं तो चुप बैठो. कोई विद्वान ही उसका उत्तर देगा.”

तब ताराम उठ खड़ा होकर बोले, “भाईयों! मैं बुद्धीजीवी तो नहीं पर जैसा मैंने समझा – एैनक का अर्थ बारीक रीती-निती और आयना या दर्पण का अर्थ साहित्य है.” अध्यक्ष ने जोर की ताली बजायी. ताराम ने स्पष्ट किया, “जिस समाज का साहित्य होता है उसे दर्पण कहते है. समाज का सब कुछ बारिकी से देखना, समझना जिसमें अच्छा बुरा निती-नियम मर्यादा के अनुसार परंपराओं को निर्वाहन करना ही संस्कृति कहलाता है.” यह सुनकर सभी ने जोर-जोर से ताली बजायी. अध्यक्ष ने कहा, “आदिवासी समाज के लेखक कवी और साहित्यकार की कमी है. साहित्य लिखने के लिये आगे आये.”

ताराम ने कहा “संकल्प तो नहीं करूंगा लेकिन कोशिश जरूर करूंगा.” तभी उन्हें फुल माला पहनाकर धन्यवाद दिया गया. तब सभा का संचालन हीरा सिंह मरकाम कर रहे थे! उन्होंने बोला, “ये नौजवान सुन्हेरसिंह ताराम एम.ए., बी.एड, यु.पी.यस.सी., एल.एल बी सेकन्ड ईयर पास कर ऐरीया ऑर्गनाइज़र (ऑफिसर) है.” सभी ने तालियों से उन्हें प्रोत्साहन दिया.

ताराम के शब्दों में, “उस सियान आदमी से मैं उल्हासित हो गया और आगे साहित्य लिखने की योजना बनायी. खूद की अपनी साहित्यीक पत्रिका निकालू. ऐसा सोच लिया.”

1980 की वैशाख पूर्णिमा में धमधा, धरमगढ़ में बावणगढ के देवता पूजा का बड़ा कार्यक्रम था. उसमें ताराम भी शामील हुए. बाद में घर जाकर अपने हिस्से की एक बैल-जोड़ी भाई के पास रखी थी, उसे 1500 रूपये मेें बेच कर पैसे एक तकिया के खोली में रखकर छोटा सा बिस्तर लेकर ज्ञान की खोेज में घर से बाहर निकल पड़े. 

ताराम अपने जीवन के इस दौर को याद करते हुए लिखते हैं, “उन पैसे से मैंने पत्रिका निकालने का सोचा और कुछ लोगों को इस बारे में बताया तो कुछ लोगों ने प्रोत्साहन दिया, मदद करने के लिये बोले, तो कुछ लोग बोले क्या करेगा पत्रिका निकालकर? कोन सा समाज का फायदा होेगा? पत्रिका निकालना तुम्हारे जैसे लोगोें का काम नही!” ऐसा कहकर उपासात्मक दुत्कार दिया. “लेकिन मैंने मन में पक्का निर्धारित कर लिया था और भोपाल से 19 दिसम्बर 1985 से पत्रिका निकाली, जो कि सोना खान के वीर नारायण की पुन्यतिथी थी. राजोदिया धर्मशाला के सभा-गृह में आयोजित कार्यक्रम में संगीत सम्राट चक्रधर सिंह पुर्रे रायगड़ राजा के सुपूत्र भानुप्रताप सिंह मुख्य अतिथी थे, जिन्होंने पत्रिका का विमोचन किया. उस वक्त भानुप्रताप सिंह के द्वारा कई कवि व लेखकों को सम्मानित किया गया — कवी: आनंद धुर्वे, कोमलसिंह मरई भोपाल, मोतीरावन कंगाली नागपुर, कल्यानसिंह वरखडे; गोंडी भाषा प्रचारक: रामनाथ ओईमा इलाहाबाद, अध्यक्ष बल्लमसिंह केसर आदि. 1987 में “गोंडवाना सगा” का नाम बदलकर “गोंडवाना दर्शन” नाम को मान्यता मिली. और रजिस्ट्रेशन नंबर “आर.एन.आय./45289/87” मिला.”

“मैं पढ़ने के लिये घर वालों से झगड़ता रहा. सातवीं क्लास में पहले नंबर से पास होकर घर से भाग गया. बाहर काम करने लगा. बगीचे मेें माली के साथ काम करता था. कपड़े प्रेस करता था. एक रूपया मजुरी मिलती थी. मजदूरी करता, और बच्चों के ट्युशन लेता था. मजदूरी के पैसे से किताब काॅपी लेता था…”- ताराम 

इसके बाद गोंडवाना दर्शन पत्रिका नियमित रूप से निकलती रही. लेखक, कवि, विचारवंत, पाठक बढ़ते गये. हर राज्य में पत्रिका पहुंच गयी. पत्र व्यवहार बढ़ते गया. लोग साहित्य के गठ्ठे के गठ्ठे पत्र भेजते रहे. पत्रिका की मांग बढती गयी. मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, ओरीसा, बिहार, झारखंण्ड आदि एक राज्य से दूसरे राज्य में पत्रिका का प्रचार और प्रसार बढ़ते गया.

ताराम के अनुसार “एक वक्त ऐसा था जब मुझे पत्रिका निकालने के लिये बहुत आर्थिक तंगी और संघर्ष करना पढ़ा, लेकिन अथक प्रयास और अविरत जनसंपर्क के कारण अभी पत्रिका अच्छे ढंग से प्रगती के लाईन मे लग गयी थी. पत्रिका में गोंडी भाषा संस्कृति, इतिहास, लिपी, प्राचीन गोंडवाना, टोटम (कुलचिन्ह), राजे-रजवाडे, महान वीर और वीरांगना — इनकी नयी-नयी जानकारी लोग भेजते रहे. मेरा संम्पादकीय लोगों को बहुत पसंद आने लगा. अब गोंडवाना दर्शन का संपादक मंडल बन गया. नये-नये लेखक नये-नये विषयों पर संशोधन करके लिखने लगे और एक अच्छा साहित्यिक लोगों का समूह बन गया.”

गोंडवाना दर्शन भारत की पहली आदिवासी समाज की पत्रिका है, जो निरंतर चल रही हैं. अपनी भाषा अपनी संस्कृति, इतिहास, लिपी और खोया हुवा इतिहास को उजागर कर रही हैं. साहित्य की ज्योत जलाने वाली और देशभर नव-चैतन्य, नयी चेतना जगाने वाली साहित्य की जगमगाती ज्योती बन गयी. इसके बारे में सभा सम्मेलन में चर्चा होती रही. अब अपने समाज की अपनी भाषा का सम्मेलन लेना चाहिये इसके उपर कई लोगों ने विचार विनीमय किया. इनमें निम्न साहित्य सम्मेलन शामिल थे:

1) साहित्य सम्मेलन, भद्रावती, जिला – चांदागढ़ (1988).

2) साहित्य सम्मेलन, वर्धा (1990).

3) साहित्य सम्मेलन, प्रगीती विहार, एन.टी.पी.सी. कोरबा (1991).

4) साहित्य सम्मेलन, वाड्रफनगर, सरगुजा (1992).

5) साहित्य सम्मेलन, रतनपुर बादलमहाल, बिलासपुर (1993).

6) साहित्य सम्मेलन, आसिफाबाद, आध्र प्रदेश (1994).

7) साहित्य सम्मेलन, भेल भोपाल पिपलानी, (1995).

8) साहित्य सम्मेलन, भिलाई (1997).

9) साहित्य सम्मेलन, गोंडवाना विकास मंडल, नागपुर (1998).

10) साहित्य सम्मेलन, चांदा फोर्ट, चांदागढ़ (2002).

11) साहित्य सम्मेलन, डिगरी काॅलेज, दुधी उ.प्र. (2005).

12) साहित्य सम्मेलन, टांगापाणी, नगरी, धमतरी, मध्यप्रदेश (2006).

13) साहित्य सम्मेलन, मैलारा टेंम्पल, बीदर, कर्नाटक (2008).

14) साहित्य सम्मेलन, राजे देवसाय आत्राम, उटनुरवाडा (2009).

15) साहित्य सम्मेलन, रायपुर, टिकरापारा (2010).

16) साहित्य सम्मेलन, शिरपुर टेंम्पल, पोलीस ग्राऊंड, बैतुल, मध्यप्रदेश (2011).

17) साहित्य सम्मेलन, बौध विहार टेम्पल मैदान, शिरपुर, महासमुन्दर (2012).

18) साहित्य सम्मेलन, मावलकर हाॅल, नई दिल्ली, गोंडी डिक्शनरी प्रकाशन (2017).

इस तरह से ताराम ने हर स्टेट में जाकर गोंडी भाषा के साहित्य सम्मेलन लेकर लोगों में गोंडी भाषा, संस्कृति, इतिहास और साहित्य की रूची बढ़ायी. अथक प्रयास और कष्ट उठाकर अनेक लोगों के साथ वो मिलते रहे और साहित्य का कारवां बढता गया. उनका मिलनसार, मृदुभाषी, शांत स्वभाव और निस्वार्थ भाव की सेवा — इसी कारण से पूरे भारत में ताराम ने अपने जीवन के 40 साल साहित्य सेवा के लिये अर्पण किये

2015 में गोंडवाना दर्शन का रजत महोत्सव बड़ी धूमधाम से रायपुर में मनाया गया. आज तक किसी भी आदिवासी समाज की पत्रिका ने इस तरह का रजत महोत्सव नहीं मनाया. ये उल्लेखनीय है. और उन्होंने गोंडवाना गोंडी साहित्य परिषद और गोंडवाना साहित्य प्रकाशन का निर्माण किया और समाज के लोगों का साहित्य प्रकाशित करने के लिये हमेशा प्रोत्साहित किया.

गोंडी साहित्य, गोंडी भाषा, गोंडवाना का इतिहास और संस्कृति के साथ ही ताराम अन्य आदिवासी समाज के भाषा, इतिहास और संस्कृति की ओर समर्पित थे. ताराम हमेशा कहते- “अपने समाज का दुःख-दर्द देखकर खोया हुआ इतिहास और सम्मान पाने के लिए भाषा, संस्कृति, इतिहास और साहित्य जिंदा रखना ही मेरा फर्ज है.”

इसके सिवाय उन्होंने कई राज्यों में सौ के उपर चर्चा-सत्र, धार्मिक कार्यक्रम, शिविर, भाषा के ऊपर सेमीनार, कार्यशाला आदि का आयोजन किया. उनके इस निस्वार्थ साहित्य सेवा के लिये उनको गोंडवाना रत्न, गोंडवाना भूषण, गोंडवाना गौरव, गोंडवाना समाज-सेवक, गोंडवाना साहित्य-सेवक इस तरह के अनेक पुरस्कार और सन्मान-पत्र मिले. और कई सम्मान-पत्र मिले. उनके जीवन में साहित्य सेवा और गोंडवाना पत्रिका के ऊपर “18 पाठ 32 बहिनी” नामक किताब लिख रहे थे. लेकिन वो अधूरा रह गया. 

पत्रिका के जनवरी 2017 के अंक में ताराम ने “गोंडवाना दर्शन के पाठक संवाददाता एवं एजेंट सावधान” नाम से एक नोटिस जारी किया, जिसमें बताया गया है कि मगरलोड, जिला धमतरी, छत्तीसगढ़ के निवासी  रमेश ठाकुर (खुशरो) ने ताराम के साथ धोखाघड़ी कर, पत्रिका को रायपुर में बिना घोषणा पत्र के छाप कर 2014 से 2017 तक अपने नाम से चला कर अभी तक बेचा. उसने छापने के आज्ञा पत्र के बिना संस्थापक और मालिक संपादक का नाम पत्रिका में उपयोग कर करीब 60 लाख रुपये की धोखाघड़ी की. गोंडवाना दर्शन का बैंक अकाउंट नंबर होते हुए भी उसने अपने निजी खाते में पाठकों और विज्ञापन दाताओं से पैसे लेता रहा. रमेश ठाकुर पर धोखाघड़ी और कॉपीराइट एक्ट के उल्लंघन के कारण छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में केस जारी है और वर्तमान में वह “गोंडवाना स्वदेश” नाम की पत्रिका चला रहा है और गोंडवाना दर्शन के पाठकों को गुमराह कर रहा है. आखिरकार, 7 नवंबर 2018 को बीमारी के बाद उनका निधन हो गया। (ताराम की मृत्यु के बाद, पत्रिका का प्रकाशन फिलहाल अस्थायी रूप से रोक दिया गया है।)

कविता कहानियां और वैचारीक लेखन करने वाले ताराम विद्या विभुषीत और गहरे विचार के धनी थे. उन्होने अभी तक 400 सम्पादकीय और 100 के उपर विविध विषय पर आलेख लिखे हैं. 2008 में उनका ओपन हार्ट सर्जरी और प्रोस्ट्रेट के तीन ऑपरेशन हो गये थे. उनको पांच बार ऑक्सीजन लगा, लेकिन उनके विल पाॅवर के कारण हर वक्त मृत्यु की हार हो गयी और ताराम की जीत होती गयी. वो हमेशा अपने काम में पढ़ाई और लिखना उनके जीवन का अविभाज्य भाग था. इस तरह समाज सेवा और साहित्य सेवा में उनको रमेश ठाकुर जैसे लोभी, ढोंगी, फसाने वाले, बेईमानी करने वाले, नकलची लोग भी मिले.

लेकिन ताराम अपनी सत्य की राह पर आखिर तक चलते रहे…..! चलते रहे…..! चलते रहे…..!

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Usha Kiran Atram

Usha Kiran Atram is a writer, poet from Koitur community. She has written and published many poems and short stories in Marathi, Gondi, and Hindi. She is also an editor of 'Gondwana Darshan' magazine. उषा किरण आत्राम कोइतूर समुदाय की एक लेखिका, कवि हैं। उन्होंने मराठी, गोंडी और हिंदी में कई कविताएँ और लघु कहानियाँ लिखी और प्रकाशित की हैं। वह 'गोंडवाना दर्शन' पत्रिका की संपादक भी हैं।

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