सरनेम में क्या रखा है? उत्तर छतीसगढ़ के आदिवासियों के इतिहास पर चिंतन

Share

Akash Poyam

Founder and Editor of Adivasi Resurgence. Akash belongs to Koitur (Gond) tribe from Balrampur, Chhattisgarh. He is an independent researcher and has written on a range of Adivasi/Tribal issues.
He can be reached at - poyam.akash@gmail.com

आदिवासी रिसर्जेंस के संस्थापक और संपादक, आकाश, बलरामपुर छत्तीसगढ़ के कोइतुर (गोंड) समुदाय से हैं। वह एक स्वतंत्र शोधकर्ता हैं और उन्होंने विभिन्न आदिवासी विषयों और मुद्दों पर लिखा है।
उन्हें इस ईमेल poyam.akash@gmail.com पर पहुँचा जा सकता है।

जब मुझे पहली बार स्कूल में दाखिला कराया गया, तो मेरे माता-पिता ने मुझे “आकाश कुमार” नाम दिया, यह माध्यमिक शाला तक बना रहा, जब इसे “आकाश कुमार प्रसाद” में बदल दिया गया और तब से यह जारी रहा। सोशल मीडिया पर लगभग एक साल तक “पोयाम” उपनाम का उपयोग करने के बाद, आखिरकार मैंने इसे आधिकारिक रूप से बदलने का फैसला किया। मैं “पोया/पोयाम” गोत्र (clan) से ताल्लुक रखता हूं—जो कोइतुर/गोंड समुदाय के 750 गोत्र में से एक है। गोंडी में पोया का अनुवाद हिन्दी में “धुआँ” और अंग्रेजी में “स्मोक” है और इसकी उत्पत्ति के पीछे की कुछ कहानियों में से एक इस प्रकार है—काफी समय पहले, कोइतुरों के क्षेत्र में एक महामारी फैली, जिसके प्रकोप ने कई लोगों की जान ले ली थी, कोई भी इसे रोकने में सक्षम नहीं था और न ही कोई इसका इलाज खोज पाया । उस समय, पोया कबीले के लोग ही थे, जिन्होंने एक जंगली पौधे की खोज की, जिसके पत्तियों से उत्पन्न – धुएँ  से उस बीमारी को ठीक किया जा  सकता था, उन्होंने तुरंत गाँव-गाँव में यात्रा की और महामारी को समाप्त करने में मदद की । औषधीय ‘धुएं’ के साथ उनके संबंध ने उन्हें “पोया” नाम दिया (जैसा कि बड़े डोंगर जात्रा के दौरान कोंडागांव-बस्तर में मेरे बड़ों द्वारा सुनाई गई है)।

इस लेख के माध्यम से मैं अपने जन्मस्थान और कोईतुर समुदाय के इतिहास को सामने रखना चाहूंगा, कुछ  ऐतिहासिक घटनाएँ  जिन्होंने हमें हमारे गोत्र की पहचान से दूर कर दिया और हमें “प्रसाद, सिंह” आदि उपनामों को अपनाने में मजबूर किया, जो किसी भी तरह से हमारे आदिवासी गोत्र और पहचान का प्रतिनिधित्व नहीं करते थे।

मेरा गाँव नवकी, बलरामपुर जिले में है (तत्कालीन सरगुजा) – जो छत्तीसगढ़ का सबसे उत्तरी भाग है और उत्तरप्रदेश, झारखंड के साथ अपनी सीमा साझा करता है । इस क्षेत्र ने ब्राह्मणवाद की घुसपैठ को राज्य में शायद सबसे पहले देखा था। इस क्षेत्र में ब्राह्मण और अन्य सवर्ण जातियों ने यूपी, बिहार से 19 वीं सदी के अंत तक बसना शुरू कर दिया था। कई कोइतुर गीतों में भी हमें इस पलायन के प्रति  ‘सावधानी बरतने ‘ का संदर्भ मिलता है।

उदाहरणार्थ –

‘बोमना ना फँदाते,

गीरजा ना कुंदाते,

हिले हनवा दादा हिले हनवा रो,

संभू ना संगेते लिंगो न पंगेते,

हिले मारुंगवा दादा,

हिले मारुंगवा रो 

इस गीत का मोटे तौर पर भावार्थ है क़ि “भाई, ब्राह्मण के धोके में आना नहीं है, दूसरी हिंदु जातिओं के खोदे गड्ढों मे गिरना नहीं है …संभू भाई के गाने मत भूलना, लिंगो की शिक्षाओं को मत भूलना” (‘संभू और लिंगो कोइतुर समुदाय के धर्म गुरु माने जाते हैं)।

ब्राह्मणवादी विरोधी अभिव्यक्ति और कोइतुर संस्कृति को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से अंततः 1916 में “गोंडवाना महासभा” का गठन हुआ। 1916-45 के बीच आयोजित इन महासभाओं ने ब्राह्मणों और हिन्दूओं के खतरे के बारे में लगातार चेतावनी दी और हिंदू कानूनों के थोपे जाने के बारे में भी आगाह किया। गोंडवाना महासभा – मंडला सम्मेलन 1945 में कहा गया कि, “क्योंकि हमारा समुदाय दूसरे धर्मों के चंगुल में फंस गया है, अगर भारत को कल स्वतंत्रता मिलती भी है तो अंग्रेज़ों के साथ केवल ईसाई वापस चले जायेंगे, लेकिन हमारी भूमि, संस्कृति और सभ्यता के ऊपर काबिज हिन्दू उपनिवेशवादी यहीं बने रहेंगे और हमारा शोषण करते रहेंगे। फिर इस देश की आजादी से क्या फायदा होने वाला है? ”(कंगाली, 1986)

सन 1951 के आते तक ‘सरगुजा में राजमोहिनी देवी’ के नेतृत्व में एक आंदोलन शुरू हो चुका था – जो कांग्रेस द्वारा समर्थित था, जिसमे हिंदू धर्म, राष्ट्रवाद और गांधीवादी विचारधारा का प्रचार किया गया। इसमें 1920 के ‘ताना भगत आंदोलन’ के साथ कई समानताएँ भी दिखी । राजमोहिनी देवी आंदोलन ने बापू धर्म सभा के माध्यम से कार्य किया और महुआ की शराब पर पाबंदी का आहवाहन किया, मांस का त्याग करना, गाय की पूजा करना, देवर (पति का छोटा भाई) से दूर रहना, खद्दर पहनना, अहिंसा का पालन करना और महात्मा गांधी आदि की शिक्षाओं का पालन करना आदि का प्रचार प्रसार किया । राजमोहनी देवी एक कोईतुर महिला थीं, जिन्हे इतिहासकारों की माने तो महात्मा (गांधी) का सपना आया था, जिन्होंने उन्हे ( राजमोहनी देवी ) 1950 के दशक के दौरान इस क्षेत्र में गंभीर सूखे के समय भूख, भुखमरी से छुटकारा पाने के लिए उनकी शिक्षाओं का पालन करने के लिए कहा था। जल्द ही हजारों अनुयायियों के मध्य उनकी एक लोकप्रिय छवि बन गई और अपनी शिक्षाओं के प्रचार के लिए इस क्षेत्र में उन्होने 30 से अधिक आश्रम स्थापित किए (कम से कम 20 आश्रम अभी भी काम कर रहे हैं)। आंदोलन के दौरान, ग्राम के देवताओं को “शुद्ध” करने और उन्हें भगत बनाने का प्रयास किया गया—इस प्रकार गाँवों के बाद गाँवों में हिन्दू धर्म का प्रचार प्रसार किया गया। इस तरह कोईतुर आदिवासी समुदाय को भगत और सगत में बाँट दिया गया – राजमोहिनी की शिक्षाओं का पालन करने वाले “भगत” और जो उनका पालन नहीं करते थे वे “सगत”। इसने एक ही समुदाय के लोगों को दो गुटों में विभाजित कर दिया, यहाँ तक कि साथ खान पान और विवाह पर भी प्रतिबन्ध लग गया।

2016 में गोविंदपुर वार्षिक उत्सव में राजमोहिनी देवी के अनुयायियों का जुलूस। (चित्र: आकाश पोयाम)

समय के साथ विभिन्न पहाड़ियों में बसे सभी पुश्तैनी पूजा स्थल को मंदिरों (मूर्तियों, मूर्तियों के साथ) में बदल गए – जबकि कोइतुर प्रकृति पूजक हैं और मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं करते हैं और इसके बाद बैगा (पारंपरिक पुजारी) का स्थान धीरे-धीरे ब्राह्मणों ने ले लिया। कोइतुर समुदाय और उनके गढ़ / गुड़ों का इतिहास डॉ. मोतीरावन कंगाली द्वारा विस्तार से कई किताबों में उल्लेखित किया गया है जो कि वर्तमान में इन स्थानों पर चल रही प्रथाओं के विपरीत है। ब्राह्मणों ने आदिवासियों के बीच ‘जनेऊ’ पहनने का भी चलन शुरू करवाया जो आज भी उस पीढ़ी के पुरुषों के बीच प्रचलन में है। इसी तरह के एक कार्यक्रम में, इस साल सितंबर 2016 में, गायत्री परिवार ने बड़वानी (मध्यप्रदेश) में एक कार्यक्रम आयोजित किया – जहाँ 2000 आदिवासियों को ‘जनेऊ’ धारण कराया गया था।

‘शुद्धि’ और ब्राह्मणीकरण की इस प्रक्रिया के द्वारा आदिवासियों को प्रतीकात्मक रूप से उच्च श्रेणी मे समझा गया और वे ‘घसिया’ (दलित समुदाय- कोइतुरों के साथ सांस्कृतिक रूप से निहित) की तुलना में सामाजिक पदानुक्रम में अपने को श्रेष्ठ मानते रहे। इस प्रकार छुआ छूत की कुरीति ग्राम समुदाय का अभिन्न अंग भी बन गयी । राजमोहिनी के आंदोलन के एक साल बाद ही 1952 में, आरएसएस द्वारा स्थापित – वनवासी कल्याण आश्रम, हमारे पड़ोसी जिले जशपुर में शुरू किया गया था। जाहिर था कि इस क्षेत्र आदिवासियों के बीच ईसाई मिशनरियों के बढ़ते प्रभाव के विरोध में हिन्दुओं की यह एक हिंसक प्रतिक्रिया थी। वनवासी कल्याण आश्रम, ने विभिन्न अभियानों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से हिंदू धर्म को बढ़ावा दिया, जिसे हम अपने गांव (हिंदू पौराणिक कथाओं रामायण, महाभारत के बारे में थिएटर और संगीत कार्यक्रमों) में देखकर बड़े हुए हैं। सरस्वती शिशु मंदिर (आरएसएस द्वारा संचालित) पास में एकमात्र स्कूल था, जो सरकारी प्राथमिक स्कूल के अलावा एकलौता ही था, इसलिए हमारे गांव में से कई को सरस्वती शिशु मंदिर में दाखिला दिया गया था। क्षेत्र में वनवासी कल्याण आश्रम की उपस्थिति ने आगामी वर्षों में ‘स्वांगीकरण’ ( बहुसंख्यक धर्म में समाहित करना ) की इस प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाया।

मेरे परदादा गाँव के एक आदिवासी मुखिया, गंवटिया थे, जिन्होंने उदारता से यूपी, बिहार के ब्राह्मण, बनिया प्रवासियों (जो अब इस क्षेत्र में भूमि / अर्थव्यवस्था के ज़्यादातर हिस्से पर कब्जा करते हैं) को जमीन दी थी। 1951 के दौर में वह एक मात्र आदिवासी मुखिया भी थे जिन्होंने शुरुवात में राजमोहिनी देवी को हमारे गाँव में प्रवेश करने से रोका था, और भगत नहीं बने। लेकिन बाद में बिहार के एक ब्राह्मण के प्रभाव में वह परिवार में हिंदू धर्म से काफी प्रभावित हो गए और “भगत” की तरह जीवन जीने लगे, इस बदलाव का वास्तविक कारण हमें आज तक पता नहीं चल सका। हालांकि इसका मतलब यह नहीं था, कि हमारे परिवार ने पूरी तरह से अपने पारंपरिक आदिवासी अनुष्ठानों और प्रथाओं से किनारा कर लिया था, बल्कि हिंदू धर्म के कुछ तत्व हमारी संस्कृति का हिस्सा बन गए, जैसे कि हिन्दू त्योहारों को मनाना। इसके अलावा, लोगों ने खुद को हिंदू के रूप में पहचानना शुरू कर दिया, भले ही हमारे पूर्वजों ने कोया पुनेम का पालन किया और – कोइतुर विश्वास प्रणाली (उनका अपना “धर्म”) का अनुसरण करते थे। हमारा खुद को हिन्दू के रूप में पहचानने का यह कारण भी था कि आजादी के बाद, देश के संविधान ने आदिवासियों को “हिन्दू” धर्म की श्रेणी में रखा गया। राज्य की नीतियों और वनवासी कल्याण आश्रम ने लोगों को यह मानने के लिए सामाजिक रूप से प्रेरित किया कि हिंदू धर्म, संस्कृति का ‘उच्चतर’ स्तर है और हमें अपने ‘आदिम’ जीवन शैली के तरीकों को दूर करने की आवश्यकता है। अनजाने में ही सही, मैं और साथ के बहुत आदिवासी साथियों में बचपन से ही अपनी पहचान के प्रति एक हीन भावना सी थी, जिससे उभरने में मुझे वर्षों लगे। उसी तरह मेरे दादा, जो हिंदू धर्म के एक दृढ़ अनुयाई बने, ने शायद हमारे गोत्र के का नाम इस्तेमाल नहीं किया और मेरे साथ भी यही चलन चलता रहा, जबकि थोड़े लोगो ने समय के साथ ‘शांडिल्य’ का इस्तेमाल किया, दूसरों ने ‘सिंह’ जैसे उपनामों का उपयोग करना शुरू कर दिया – ये दोनों हमारे पोयाम कुनबे/वंश के अनुरूप नहीं थे। हिन्दू धर्म के उपनामों को रखना एक तरीके से उच्च समझा जाने लगा।

(सल्लागागरा और गोंडवाना का ध्वज। यह हाल के दिनों में गोंडी धर्म और गोंडवाना आंदोलन का समाज में एक लोकप्रिय प्रतीक बन गया है।)

चूंकि प्रसाद उपनाम ने मेरी आदिवासी पहचान को उजागर नहीं किया, इसलिए मेरी अधिकांश शिक्षा के दौरान शिक्षकों और छात्रों ने मुझे आदिवासी के रूप में नहीं पहचाना और मैंने इसके दुष-परिणामों (शर्मिंदगी और हीन भावना) को जानते हुए शायद ही कभी इसका खुलासा किया। मैं अपने गोत्र “पोयाम” के बारे में जानता था, लेकिन यह नहीं जानता था कि हमने अपने नामों के बाद इसका उपयोग क्यों नहीं किया। जब मेरा कस्बे के एक मिडिल स्कूल मे दाखिला कराया गया था, तो मेरे कुछ सहपाठी अक्सर शुद्ध हिंदी बोलने में मेरी असमर्थता को लेकर हँसी उड़ाते थे, मुझे ‘पोयाम’ नाम का उल्लेख कर मखौल उड़ाना और धौंसियाना भी झेलना पड़ा। चिढ़ाना और नाम पुकारना शायद मजाक भी माना जा सकता है लेकिन फिर भी मैं अपने उपनाम का उल्लेख करने की कभी हिम्मत नहीं जुटा सका। यह हैदराबाद विश्वविद्यालय में मेरे एम.ए. के दौरान ही था, जब मैंने गोंडवाना के इतिहास के बारे में जाना और मुझे अन्य क्षेत्रों के कोइतुर बुजुर्गों के साथ मिलने और बातचीत करने का सौभाग्य मिला, डॉ. कांगली की पुस्तकें, आदिवासी और अम्बेडकरवादी साहित्य ने मुझे न केवल सशक्त किया, बल्कि इन चीज़ों ने ब्राह्मणवाद के उत्पीड़न की इस गहरी जड़ के बारे में मुझे अवगत कराया और मुझे अपने आदिवासी पहचान पर दृढ़तापूर्वक गर्व करने में मदद की। आदिवासी उपनाम केवल उपनाम नहीं हैं, बल्कि गोत्र/वंश का प्रतिनिधित्व करते हैं; वे जनजाति के भीतर हमारे सामाजिक स्थान का संकेत देते हैं, वे रिश्तेदारी संबंधों को पहचानने और प्रबंधित करने में मदद करते हैं, इसके अलावा वे समुदाय के अलिखित इतिहास को संजोय होते हैं और हमें अपने अतीत की समझ होने में सक्षम बनाते हैं। और आज, हालाँकि सरनेम/उपनाम बदलने का यह कार्य जितना भी छोटा रहा होगा, यह एक आज़ादी की अनुभूति देता है।


यह लेख पहले राउंड टेबल इंडिया में 20 दिसंबर 2016 को प्रकाशित हो चुका है


इस लेख का अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद आकृति उइके ने किया है

This post has already been read 3432 times!


Share

Akash Poyam

Founder and Editor of Adivasi Resurgence. Akash belongs to Koitur (Gond) tribe from Balrampur, Chhattisgarh. He is an independent researcher and has written on a range of Adivasi/Tribal issues. He can be reached at - poyam.akash@gmail.com आदिवासी रिसर्जेंस के संस्थापक और संपादक, आकाश, बलरामपुर छत्तीसगढ़ के कोइतुर (गोंड) समुदाय से हैं। वह एक स्वतंत्र शोधकर्ता हैं और उन्होंने विभिन्न आदिवासी विषयों और मुद्दों पर लिखा है। उन्हें इस ईमेल poyam.akash@gmail.com पर पहुँचा जा सकता है।

2 thoughts on “सरनेम में क्या रखा है? उत्तर छतीसगढ़ के आदिवासियों के इतिहास पर चिंतन

  • March 26, 2019 at 6:04 pm
    Permalink

    मेंरा भाई, मुझें तुझ पर गर्व है।

    Reply
  • March 28, 2019 at 11:22 pm
    Permalink

    loved the article!! felt like a journey to me !!

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *