सबरनाखा

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Chandramohan Kisku

दक्षिन पूर्व रेलवे में कार्यरत चंद्रमोहन किस्कु की संताली भाषा में एक कविता पुस्तक "मुलुज लांदा"साहित्य अकादेमी दिल्ली से प्रकाशित हो चुकी है। वे संताली से हिंदी, हिंदी से संताली, बांग्ला से संताली में परस्पर अनुवाद करते हैं और अखिल भारतीय संताली लेखक संघ के आजीवन सदस्य हैं।
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सबरनाखा

मैं सबरनाखा
सोना माई
बहते चल रही हूँ
सोहराय, करम, माघे की
नाच और गीत के ताल में
रसीली हांडिया और
महुआ शराब के नशे में
हर्ष और आनंद के साथ
नाचते और गाते जा रही हूँ

अब मेरी
नाच की ताल में और
सुरीली सुर पर
काला जादू लग गया
 दुश्मनों की बुरा नजर
लग गयी है
डायन – नाज़ोमों की
बुरी नजर से भी
भयानक

अब मेरी सहर्ष नाच कहाँ है
कल-कल की गीत भी
अबरुद्ध हो गयी है
मेरे चलने के पथ पर
बड़े -बड़े डैम
बन गये हैं
शहर – नगर और
कल – कारखानों की गंदगी
मेरे सोने जैसी देह पर
लीपते है

अब मेरी देह पर
चमकने वाली सोना नहीं है
कूड़ा -कचरा और गन्दगी से
कोयला जैसा काला हुआ हूँ

अब मैं
बहती नहीं हूँ
अपने से ही दूर
बहुत दूर
चली जा रही हूँ


सबरनाखा – Subarnarekha River flows through Jharkhand, West Bengal and Odisha.


Image : Subarnarekha river (courtesy: IndiaWaterPortal)

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दक्षिन पूर्व रेलवे में कार्यरत चंद्रमोहन किस्कु की संताली भाषा में एक कविता पुस्तक "मुलुज लांदा" साहित्य अकादेमी दिल्ली से प्रकाशित हो चुकी है। वे संताली से हिंदी, हिंदी से संताली, बांग्ला से संताली में परस्पर अनुवाद करते हैं और अखिल भारतीय संताली लेखक संघ के आजीवन सदस्य हैं।

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