वर्ल्ड इंडिजेनस डे : आखिर क्यों मना रहे हैं हम देशज भाषाओं का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष?

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Dr. Surya Bali

कोइतुर समुदाय के डॉ. सूर्या बाली फोर्ड फाउंडेशन इंटरनेशनल फेलो हैं। वे एक स्थापित गजलकार, लेखक और उर्दू के अदीब है। सामुदायिक चिकित्सा में एमडी हैं और अमेरिका से एमएचए की उपाधि हासिल की है। सम्प्रति एम्स भोपाल में प्रोफ़ेसर के पद पर कार्यरत हैं।

भाषाएँ हमारे रोज़मर्रा के जीवन में बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाती हैं। हमारी भाषा हमारी सांस्कृतिक विविधता और पारस्परिक संवाद सुनिश्चित करने के करने के साथ ही साथ मानवाधिकारों के संरक्षण, शांति के निर्माण और सतत विकास करने में हमारी मदद करती है। फिर भी भाषाओं के विशाल मूल्य के बावजूद, दुनिया भर की भाषाएं विभिन्न कारकों के कारण खतरनाक दर से गायब हो रही हैं जिनमें से कई देशज भाषाएं हैं।

भाषा शब्द भाष धातु से आता है जिसका अर्थ होता है बोलना या कहना। भाषा मानव मुख से निकली वह सार्थक ध्वनियाँ हैं जिसके माध्यम से विचारों का आदान प्रदान किया जा सकता है। भाषाविद बोन्द्रिय के अनुसार भाषा एक तरह का संकेत है जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचारों को प्रकट करता है।

भाषा का समाज से गहरा संबंध होता है। कोई एक विशेष भाषा, उस भाषा के बोलने वाले समाज की एक बहुमूल्य संपत्ति होती है। मानव जिस समाज में पाला पोसा जाता है, वह उसी समाज की भाषा बोली बोलने लगता है। मानव समाज से बाहर रहकर आप कोई भाषा न तो सीख सकते हैं और न बोल सकते हैं इसीलिए कहा जाता है समाज के बिना भाषा का कोई अस्तित्व नहीं होता है। भाषा किसी भी समाज और संस्कृति समझाने के लिए जरूरी होती है और बिना भाषा रुपी कुंजी के संस्कृति रुपी घर के ताले को खोल पाना नामुमकिन है।

भाषा एक परंपरागत साधन है यानि समाज की परम्पराओं से भाषा का ज्ञान प्राप्त होता है और वह भविष्य में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में परिष्कृत, सुसंस्कृत और परिमार्जित होता रहता है। कोई भी व्यक्ति भाषा को अर्जित करता है यह किसी को जन्म से नही आती। कोई भी भाषा किसी व्यक्ति, परिवार, समाज या देश की निजी संपत्ति न होकर सार्वजनिक होती है जिसे कोई अर्जित कर सकता है(1)।

भाषा परिवर्तनशील है जो जगह जगह पर अपना रूप बदलती रहती है। कबीर ने कहा भी है कि कोस कोस पे पानी बदले, चार कोस पे वाणी। जब हम किसी भाषा की उत्पत्ति, उसके विकास, उसके वर्गीकरण, अर्थ परिवर्तन, ध्वनि परिवर्तन या उसके रूपात्मक संरचना का अध्ययन करते हैं तो उसे भाषा विज्ञान कहते हैं।

आर्यों के आगमन से पहले आधुनिक भारत में कई विकसित देशज भाषाएँ थीं. धीरे धीरे आर्यों ने हिन्दू धर्म और इंडो आर्यन भाषा परिवार की संस्कृत-हिंदी भाषाओं को चारों तरफ फैलाया और प्राचीन कोइतूर भाषाओं को खत्म करने का षणयंत्र रचना शुरू किया जो आज तक जारी है।

भारत में सभी देशज समुदायों की अपनी विशिष्ट भाषाएं हैं जिन्हें मुख्यतः तीन भाषा परिवारों में रखा गया है—द्रविड़, ऑस्ट्रो एशियाटिक और तिब्बत-बर्मन। लेकिन कुछ देशज भाषाएं भारोपीय या हिन्द-यूरोपीय भाषा परिवार के अंतर्गत भी आती हैं। प्राचीन आदिवासी भाषाओं में ‘भीली’ बोलने वालों की संख्या सबसे ज्यादा है जबकि दूसरे नंबर पर ‘गोंडी’ भाषा और तीसरे नंबर पर ‘संताली’ भाषा है।

भारत की 114 मुख्य भाषाओं में से मात्र 22 भाषाओं को ही संविधान की आठवीं अनुसूची में जगह मिल पायी है। अभी तक केवल तक केवल दो प्राचीन आदिवासी भाषाएँ—संताली और बोड़ो को ही इस अनुसूची में जगह मिल पायी है। राजस्थान में बोली जाने वाली भीली या भिलौड़ी भाषा बोलने वालों की संख्या 1.04 करोड़ है और मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में बोली जाने वाली गोंडी भाषा को बोलने वालों की संख्या 29 लाख से अधिक है और ये दोनों भाषाएँ गैर-सूचीबद्ध भाषाओं में क्रमशः पहले और दूसरे स्थान पर हैं। हैं। दुर्भाग्य देखिये जो संस्कृत भाषा केवल 24821 लोगों द्वारा बोली जाती है उसे भारत की भाषाओं की अनुसूची में स्थान मिला है(जनगणना 2011) लेकिन उससे ज्यादा और विस्तृत क्षेत्रों में बोली जाने वाली कोइतूर भाषाओं को गैर अनुसूची में रखा गया है(2)।

भारत में 1871 से लेकर 1941 तक हुई जनगणनाओं में अंग्रेजों द्वारा कोइतूरों को अन्य धमों से अलग धर्म में गिना गया है, जैसे अन्य धर्म-1871, एबोरीजिनल 1881, फारेस्ट ट्राइब-1891, एनिमिस्ट-1901, एनिमिस्ट-1911, प्रिमिटिव-1921, ट्राइबल रिलिजन -1931, “ट्राइब-1941” इत्यादि नामों से वर्णित किया गया है। लेकिन आजादी के बाद हुई जनगणनाओं में देशज/इंडिजेनस समुदायों के अस्तित्व को ही नकार दिया गया और इस तरह 1951 की जनगणना के बाद से इनकी अलग से गणना करना बन्द कर दिया गया है।(भारतीय जनगणना रेकार्ड)

इस तरह जब किसी समुदाय को ही खत्म कर दिया गया तो आप समझ सकते हैं उससे जुड़ी हुई भाषा संस्कृति को कितना महत्त्व दिया जाएगा। यही कारण है कि आज इस देश की मूल भाषाएँ विलुप्त होने की कगार पर पहुँच गई है। अगर इन भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन की समुचित व्यवस्था नहीं की गयी तो आने वाले भविष्य में न तो कोइतूर बचेगा और न ही उसकी भाषा संस्कृति।

आज भी विश्व में बड़ी संख्या में देशज भाषाएं लोगों द्वारा बोली जाती हैं। यह अनुमान लगाया जाता है कि, हर 2 सप्ताह में, एक देशज भाषा गायब हो रही है जिसके कारण देशज संस्कृतियों और ज्ञान प्रणालियों को जोखिम में डालती है। इसीलिए, इस अंतर्राष्ट्रीय दिवस पर लक्ष्य यह है कि देशज भाषाओं के महत्वपूर्ण नुकसान की ओर ध्यान आकर्षित किया जाए और उन्हें राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर संरक्षित, पुनर्जीवित और बढ़ावा देने की प्रयास तेज किये जाएँ। इन देशज भाषाओं (indigenous language) के अस्तित्व पर संभावित खतरे को देखते हुए ही संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस वर्ष इन भाषाओं को संरक्षित रखने लिए एक थीम दिया है जिसका नाम है- देशज भाषाएँ (Indigenous Languages). यहाँ तक की संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 2019 को देशज भाषाओं के अंतर्राष्ट्रीय वर्ष (the International Year of Indigenous Languages.) के रूप में मनाने का संकल्प लिया है(3)।

इन्ही देशज भाषाओं में से एक भाषा है गोंडी जो मध्य भारत में बोली और समझी जाती है। जिसका हजारों वर्षों का अपना इतिहास है। जिस भाषा को कभी इस देश के सभी नागरिक बोलते थे आज उसका खुद का अस्तित्व खतरे में है। कोइतूर भाषाओं में गोंडी को कोइयां (Koiyan) कहा जाता है और उसको बोलने वालों को कोइतूर कहते हैं(4)। भारत में बोली जाने वाली जनजातीय भाषाओं में मुख्यतया निम्नलिखित भाषाएँ आज भी बोलचाल और प्रचलन में हैं — गारो जनजाति, चकमा जनजाति, नागा जनजाति, गोंड जनजाति, मिजो जनजाति, मुंडा जनजाति, संथाली जनजाति, खसिया जनजाति, उरांव जनजाति और मणिपुर जनजातिभारत के कुछ प्रमुख जन जातीय भाषा-भाषी समूह हैं। भारत में कुछ देशज भाषाएँ बोलने वाले कुछ जन जातीय समूह आज भी हैं जैसे अबुझमारिया, गारो, औरिया, त्संगला, सौराष्ट्र इत्यादि (7)।

गारो एक प्राचीन देशज भाषा है जो गारो पहाड़ियों, मेघालय, त्रिपुरा, पश्चिमी असम और नागालैंड में और आसपास रहने वाले देशज लोगों( जन जातियों) द्वारा बोली जाती है। वहीं एक अन्य देशज भाषा अबुझमारिया है जो बस्तर जिले के अबुझमार पहाड़ियों के हिल मारिया जनजातियों द्वारा बोली जाती है। यह भाषा द्रविड़ भाषा परिवार की है। पटनौली या सौराष्ट्र एक अन्य देशज भाषा है जो गुजरात के कुछ हिस्सों में बोली जाती है। गादाबा भी एक प्राचीन देशज भाषा है जो उड़ीसा के कोरापुट जिले सहित कुछ भागों में बोली जाती है। अरिया मध्य प्रदेश के जनजातीय समुदायों और अरुणाचल प्रदेश के कुछ गांवों में बोली जाने वाली ज़ंगला भाषा है(8)।

भाषा अनुसंधान एवं प्रकाशन केंद्र, बड़ोदरा और गुजरात के तेजगढ़ में आदिवासी अकादमी के संस्थापक निदेशक और भारतीय लोक भाषा सर्वेक्षण (पीएलएसआई) की अध्यक्ष और भाषाविद गणेश एन देवी ने बताया है कि दुनिया की 6,000 भाषाओं में से 4,000 भाषाओं पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है जिनमें से दस फीसदी भाषाएं भारत में बोली जाती हैं। उन्होंने कहा कि दूसरे शब्दों में, हमारी कुल 780 भाषाओं में से 400 भारतीय भाषाएं विलुप्त हो सकती हैं(6)। भारत में सबसे ज्यादा खतरा देशज (Indigenous ) भाषाओं पर मड़रा रहा है । अगर जन जातीय कोइतूर भाषाओं को बचाने की कोई कारगार तरीके न विकसित किए तो ये सभी जन जातीय या देशज भाषाएँ काल के गाल में समा जाएंगी(9)।

अगर हम अपनी भाषा में संगीत, साहित्य और कला की रचना करते हैं और उसका प्रदर्शन करते हैं तो वह भाषा जिंदा रहेगी। आज वही भाषाएँ फल फूल रही हैं जिनमें प्रचुर मात्रा में साहित्य सृजन हो रहा है और सिनेमा, टीवी और पत्र पत्रिकाओं से मनोरंजन और अध्ययन के लिए जिन भाषाओं का आज भी इस्तेमाल हो रहा है वे भाषाएँ कभी नही मरेंगी।

आज सरकार भी जनजातीय भाषाओं के प्रति उदासीन है। जन जातीय भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए पर्याप्त धन नहीं उपलब्ध है। इन भाषाओं में साहित्य सृजन को प्रोत्साहित नहीं किया जा रहा है। पठन पाठन में इन भाषाओं को शामिल नही किया जा रहा है। स्थानीय और देशज भाषाओं के अध्यापकों और शिक्षकों की नियुक्तियाँ नहीं की जा रही हैं इसलिए आने वाली पीढ़ियाँ इन भाषाओं से दूर होती जा रही है और उन्हे अपने भाषा संस्कृति से लगाव खत्म होता जा रहा है जो किसी भी संस्कृति और सभ्यता के लिए अच्छे संकेत नहीं है।

आइये इस वर्ष विश्व के देशज लोगों के अंतर्राष्ट्रीय दिवस के अवसर पर हम सभी देशज भाषाओं को संरक्षित , सुरक्षित, संवर्धित और विकसित करने के लिए अपने अपने क्षेत्रों के जन प्रतिनिधियों, सरकारों,सामाजिक, धार्मिक, गैर सरकारी संस्थाओं और लोगों से अपील करें कि वे अपने आस पास की भाषाओं को संरक्षण दें और उन्हें विकसित करने में मदद करें।

विशेष रूप से देशज भाषा अन्य देशज मुद्दों, विशेष रूप से शिक्षा, वैज्ञानिक और तकनीकी विकास, जीवमंडल और पर्यावरण, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, रोजगार और सामाजिक समावेश की एक विस्तृत श्रृंखला में एक महत्वपूर्ण कारक हैं। आइये सभी लोग मिलकर वर्ष 2019 को सही मायने में “देशज भाषाओं का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष” बनाएँ और देशज भाषा बोली को संरक्षित करें।


सन्दर्भ सूची:

  1. भाषा की परिभाषा। भाषा क्या है अंग अथवा भेद । भाषा के अभिलक्षण https://www.hindivibhag.com/भाषा-की-परिभाषा/. Accessed on 05.08.2019
    2. मोहित पारीक : भारत में सबसे ज्यादा हिंदी बोलते हैं लोग, संस्कृत की हालत खराब https://aajtak.intoday.in/education/story/hindi-is-most-spoken-language-in-india-tedu-1-1012267.html Accessed on 05.08.2019. 
    3. संयुक्त राष्ट्र संघ : विश्व के देशज लोगों का अंतर्राष्ट्रीय दिवस – 9 अगस्त (United Nations: International Day of the World’s Indigenous Peoples : 9 August) https://www.un.org/en/events/indigenousday/Accessedon 05.08.2019.
    4. विलियमसन एम डी . गोंडी ग्रामर एंड वोकाबोलरी, चर्च मिशनरी सोसाइटी मंडला , सोसाईटीज फॉर प्रमोटिंग क्रिश्चन नालेज 1698. गिल्बर्ट एवं रिविंग्टन लिमिटेड द्वारा प्रकाशित। सेंट जान हाउस , क्लरकेनवेल रोड, लंदन, पृष्ट संख्या 60
    5. अंतर्राष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिकार समूह, अल्पसंख्यकों और स्वदेशी लोगों की विश्व निर्देशिका – भारत: आदिवासी, 2008(Minority Rights Group International, World Directory of Minorities and Indigenous Peoples – India : Adivasis, 2008,) available at: https://www.refworld.org/docid/49749d14c.html [accessed on 5 August 2019]
    6. द वायर : दुनिया की 6,000 भाषाओं में से 4,000 के विलुप्त होने का ख़तरा। available at : http://thewirehindi.com/…/plsi-says-400-indian-languages-a…/ [ Accessed on 06 August 2019]
    7. मंगल सिंह मसराम (1951) गोंडी लिपि [Gondīlipi]. सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ इंडियन लैड्ग्वेजेज Central Institute of Indian Languages, Multi- ̣ media library, photograph no. 64.
    8. भारतीय आदिवासी भाषाएँ: जीके टुडे हिन्दी , प्रथम पुब्लिकेशन 5 मार्च 2019 ;https://hindi.gktoday.in/gyankosh/भारतीय-आदिवासी-भाषाएँ/ [accessed on 6 August 2019]
    9. इस्तियाक एम् . भारत में अनुसूचित जनजातियों में भाषा परिवर्तन: एक भौगोलिक अध्ययन। वॉल्यूम VIII, मोतीलाल बनारसीदासप्रकाशक निजी सीमित, दिल्ली; प्रथम संस्करण आईएसबीएन: 81-208-1617-x

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कोइतुर समुदाय के डॉ. सूर्या बाली फोर्ड फाउंडेशन इंटरनेशनल फेलो हैं। वे एक स्थापित गजलकार, लेखक और उर्दू के अदीब है। सामुदायिक चिकित्सा में एमडी हैं और अमेरिका से एमएचए की उपाधि हासिल की है। सम्प्रति एम्स भोपाल में प्रोफ़ेसर के पद पर कार्यरत हैं।

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