युरेनियम की विकिरण

Share

Chandramohan Kisku

दक्षिन पूर्व रेलवे में कार्यरत चंद्रमोहन किस्कु की संताली भाषा में एक कविता पुस्तक "मुलुज लांदा"साहित्य अकादेमी दिल्ली से प्रकाशित हो चुकी है। वे संताली से हिंदी, हिंदी से संताली, बांग्ला से संताली में परस्पर अनुवाद करते हैं और अखिल भारतीय संताली लेखक संघ के आजीवन सदस्य हैं।

Picture by Ashish Birulee (Galli.in)


सागर के अस्थिर पानी जैसा
उबल रहा है मेरा मन

आज बोलने के लिए
मजबूर हो रहा हूँ
धन-दौलत से भरे
इस युग में
मनुष्य ही क्यों मनुष्य का
दुश्मन बना है?
क्यों देख और मुलाकात के
साथ ही
काटना और मारना चाहता है?

किसका होगा यह धन-दौलत
जब मनुष्य ही खत्म हो जाएगा
यह धरती निर्जन हो जाएगा
जब प्रकृति ही डरने लगे

क्या वह भूल गये हैं
हिरोशिमा और नागासाकी में
बम की विस्फोट
भोपाल की वह गैस रिसाव
जहाँ हजारों लोग मरे थे
और लाखों लोग दिव्यांग हुए थे.

जहाँ मेरा जन्म हुआ
और प्यार के साथ बड़ा हुआ
युवावस्था में जिसे प्यार किया
मेरे बच्चे जिनके गालों में
चुमने से नहीं थकते
और मेरे सर पर प्यार की
वर्षा करने वाले
देवता समान माता-पिता
आज विकिरण के भयंकर
कुप्रभाव से
उस काले नाग के डँसने से
सबको खो दिया
और मैं युरेनियम के
विकिरण का गुण
दुनिया को बताने के लिए
देह पर सड़ा घाव लेकर
आज भी जिन्दा हूँ.

This post has already been read 1383 times!


Share

Chandramohan Kisku

दक्षिन पूर्व रेलवे में कार्यरत चंद्रमोहन किस्कु की संताली भाषा में एक कविता पुस्तक "मुलुज लांदा" साहित्य अकादेमी दिल्ली से प्रकाशित हो चुकी है। वे संताली से हिंदी, हिंदी से संताली, बांग्ला से संताली में परस्पर अनुवाद करते हैं और अखिल भारतीय संताली लेखक संघ के आजीवन सदस्य हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *