मैं लिखूंगी प्यार

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मैं लिखूंगी प्यार
उस दिन
जिस दिन
मनुष्यों की ईर्षा की आग से
सुख जाएंगे
पेड़-पौधों के
हरे पत्ते
उजड़ना आरम्भ होगा जंगल
और
धँसनी शुरू होगी
ऊँची पहाड़ी

मैं लिखूंगी प्यार
उस दिन
जिस दिन
नदी में पानी के बदले
बहेंगे लाल खून
और मनुष्यों के आंसू

मैं लिखूंगी प्यार
उस दिन
जिस दिन
बंजर हो जाएगी धरती
अन्न पैदा नहीं होंगे
सर ऊँचा कर खड़े रहेंगे
कैक्टस
लोगों की अभिलाषा और आनंद
मर जायेंगे
साँस फूलने लगेगा
हिंसा की काली धुँवा से

मैं लिखूंगी प्यार
उस दिन
जिस दिन
तुम मुझे प्यार नहीं करोगे
प्यार मेरा कडुआ लगेगा
उसी दिन चला जाऊंगा
तुम्हे छोड़कर दूर देश को
छोड़कर जाऊंगा
तुम्हारे लिए
मीठी प्यार
ताकि महसूस कर सको
प्यार करने का दर्द…

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Chandramohan Kisku

दक्षिन पूर्व रेलवे में कार्यरत चंद्रमोहन किस्कु की संताली भाषा में एक कविता पुस्तक "मुलुज लांदा" साहित्य अकादेमी दिल्ली से प्रकाशित हो चुकी है। वे संताली से हिंदी, हिंदी से संताली, बांग्ला से संताली में परस्पर अनुवाद करते हैं और अखिल भारतीय संताली लेखक संघ के आजीवन सदस्य हैं।

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