मेरे स्वप्न पर IPC 144

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Chandramohan Kisku

दक्षिन पूर्व रेलवे में कार्यरत चंद्रमोहन किस्कु की संताली भाषा में एक कविता पुस्तक "मुलुज लांदा"साहित्य अकादेमी दिल्ली से प्रकाशित हो चुकी है। वे संताली से हिंदी, हिंदी से संताली, बांग्ला से संताली में परस्पर अनुवाद करते हैं और अखिल भारतीय संताली लेखक संघ के आजीवन सदस्य हैं।

Featured Image: Subrata Biswas/LiveMint


मेरे स्वप्न पर IPC 144

मेरी फूटी छज्जा
पुआल की झोपडी में
खजूर पाटिया
फटा गद्दा पर मैं
लेट कर तकते रहता था
आसमान की ओर
और सोरेन इपिल ,भुरका इपिल
बूढ़ी परकोम को देख -देखकर
डूब जाता था
स्वप्नों के नगर में
वन के फल ,फूल और मूल
खाकर भूल जाता था

पेट आग
और स्वप्नों में
मीठी -मीठी पकवान बनाता था
मेरे सामने घूमते रहता था
वह पकवानें
जब से
छीन लिया है हमसे
आधा कट्ठा जमीन
जहाँ मैं
पुआल और घास -फूस से
झोपड़ी बनाया था
छीन लिया हमसे
पुरखों से मिली
वन -जंगल और नदी
जंहा से मुझे
खाना मिलता था

सुन रहा हूँ
वहाँ
सरकार नगर बसायेगी
हिल स्टेशन
गरीबों को खदेड़कर
अमीरों के लिए रहने की जगह
बदल रहा है वक्त
बदल रहे है समाज के नियम
अब मेरे स्वप्न पर भी
सरकार ने लगाया है
IPC 144
मेरे हक़ और अधिकार के
पथ पर
बनाई है ऊँची दीवार
और मेरी निर्धनता
उसके लिए बनी है
छाती फुलाकर
जोर-जोर की हँसी।

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*सोरेन इपिल ,भुरका इपिल ,बूढी परकोम =संताल ज्योतिष के अनुसार तारों के समूह का नाम


 

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दक्षिन पूर्व रेलवे में कार्यरत चंद्रमोहन किस्कु की संताली भाषा में एक कविता पुस्तक "मुलुज लांदा" साहित्य अकादेमी दिल्ली से प्रकाशित हो चुकी है। वे संताली से हिंदी, हिंदी से संताली, बांग्ला से संताली में परस्पर अनुवाद करते हैं और अखिल भारतीय संताली लेखक संघ के आजीवन सदस्य हैं।

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