भारतीय मूल का प्राकृतिक नववर्ष “पूनल सावरी”: डॉ सूर्या बाली “सूरज धुर्वे”

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Dr. Surya Bali

कोइतुर समुदाय के डॉ. सूर्या बाली फोर्ड फाउंडेशन इंटरनेशनल फेलो हैं। वे एक स्थापित गजलकार, लेखक और उर्दू के अदीब है। सामुदायिक चिकित्सा में एमडी हैं और अमेरिका से एमएचए की उपाधि हासिल की है। सम्प्रति एम्स भोपाल में प्रोफ़ेसर के पद पर कार्यरत हैं।

आइए आज आपको प्राकृतिक नववर्ष की बधाई देते हुए इसके इतिहास और वर्तमान स्वरूप की जानकारी भी दे दें। भारत को आर्यों के आगमन से पहले कोयामूरी द्वीप कहते थे। कोया गोंडी भाषा का एक बहुत ही महत्वपूर्ण शब्द है जिसका मतलब माँ की कोख, गुफ़ा और महुए का फूल (इरुक पूंगार) होता है । इस धरती पर इस भौगोलिक भूभाग में पहला मानव माँ की कोख से आया और बड़ा होने पर भोजन के रूप में सर्वप्रथम महुए का सेवन किया और प्राकृतिक गुफाओं में जीवन यापन किया। इसलिए आर्यों के आगमन से पूर्व इस देश के मूलनिवासियों को कोयतूर या कोयतोड़ कहते थे और उनके जीवन शैली या प्रचलित मानव धर्म को कोयापुनेम कहते थे।

यही कोया पुनेम आर्यों के आगमन के बाद वैदिक धर्म, फिर बौद्ध धर्म, फिर सनातन धर्म से और आज के इस्लाम और हिन्दू धर्म के प्रभाव के बाद भारत के कुछ क्षेत्रों में आज भी प्रचलन में है। इतने धर्मों के प्रभाव के बाद भी लगभग 5000 साल से कोया पुनेंम आज भी जन जातियों के मध्य जीवित है और जनजातियों की जीवन शैली बना हुआ है। आर्यों के आक्रमण से पहले पूरे कोया द्वीप की संस्कृति की झलक आप हड़प्पा और मोहनजोदड़ों की खुदाई से मिली संस्कृतियों में देख सकते हैं ।

पूनल सावरी (नववर्ष) भी इसी संस्कृति का एक हिस्सा है जिसका स्वरूप आज भी हजारों सालों के बावजूद बदला नहीं है। वैदिक काल से पहले से लेकर आज तक 4000-5000 साल के अंतर के बावजूद आज भी मूल प्राकृतिक नववर्ष की अवधारणा अभी भी प्रचलन में है, जो विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न विभिन्न नामों से जानी जाती है लेकिन एक साथ मनाई जाती है। इसी प्राकृतिक नववर्ष को पूनल सावरी कहते हैं जिसे सामान्य लोग लगभग भूल गए हैं लेकिन मध्य भारत के जनजातीय क्षेत्रों में आज भी इसे पूर्ववत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

गोंडी भाषा में पूनल का अर्थ नया और सावरी का अर्थ वर्ष होता है। यानि पूनल सावरी का मतलब नववर्ष होता है। आज यह नववर्ष हिंदूवर्ष चैत के प्रथम दिन यानि चैत प्रतिप्रदा से शुरू होता है। गोंडी में सेमल के पेड़ को ’सावरी मड़ा’ कहते हैं और सावरी शब्द यहीं से लिया गया है क्यूंकि इस समय सेमल के पेड़ में लाल लाल पुष्प आते हैं जो प्राकृतिक चक्र शुरू होने के धोतक है। ध्यान रहे कि प्रकृति में इसी समय हजारों अन्य वृक्षों में भी फूल आते हैं लेकिन सेमल के पेड़ को ही इस वर्ष का प्रतीक क्यूँ माना जाता है ?

सेमल प्रकृति का एक ऐसा पेड़ है जिसमें एक से लेकर बारह पत्तों का क्रम मिलता है। सेमल प्रकृति का अकेला ऐसा वृक्ष है जिसकी किसी टहनी पर एक पत्ते से लेकर 12 पत्तों तक लगे मिलते हैं जो वर्ष के बारह महीनों का प्रतीक रूप होता है। कोयपुनेमी मुठवा पारी पहाण्दी कुपार लिंगों ने इसी पेड़ के नीचे बैठकर, इसी दिन पूरे कोया समाज को बारह कुल गोत्रों में बांटा था और 33 शिष्यों को दीक्षा देकर कोया पुनेम के प्रचार प्रसार के लिए तैयार किया था।
गोंडी या कोयतोड़ व्यवस्था में प्रथम माह को उंदोमान या मड़ मान कहलाता है ( गोंदी में मड़ का अर्थ मधुर और मान का अर्थ महीना होता है ) जिसे हिन्दू लोग मधु मास कहते हैं ।

गोंडी महीनों के नाम
1. उंदोमान
2. चिंदोमान
3. कोदोमान
4. नालोमान
5. सायोमान
6. सारोमान
7. येरोमान
8. अरोमान
9. नरोमान
10. पदोमान
11. पादूमान
12. पांडामान

प्राचीन भारत(कोयामूरी द्वीप) एक कृषि प्रधान देश था और यहाँ के सभी त्यौहार केवल फसलों पर आधारित हुआ करते थे, जिन्हे बाद में आर्यों के आक्रमण के बाद कई किंवदंतियों, देवी देवताओं और धार्मिक अनुष्ठानों से जोड़ दिया गया और प्राचीन कोयतूरियन परंपराओं में वैदिक कर्मकांड डालकर मूल स्वरूप को विकृत कर दिया गया है। पूनल सावरी भी नयी प्राकृतिक चक्र के आगमन का स्वागत और अभिनंदन है जिसमे प्रकृति में नए सृजन की संभावनाओं की शुरुवात होती हैं।

पूरे वर्ष में कोयतोड़ कृषि व्यवस्था को दो मूल भागों में विभाजित किया जाता है उन्हारी (रबी की फसल ) और सियारी (खरीफ की फसल) । चूंकि पहले सिंचाई के साधन नहीं हुआ करते थे और पूरी कृषि व्यवस्था केवल वर्षा पर निर्भर होती थी इसलिए वर्ष में केवल दो फसल ही ली जाती थी। जैसे जैसे विकास के क्रम में हम आगे बढ़े वैसे वैसे सिचाई के साधनों में बढ़ोत्तरी हुई और रबी और खरीफ के अलावा जायद की फसल भी लेने लगे । उन्हारी और सियारी फसलों के बीच में जो तीन महीने का अंतर होता था उसमें ही शादी विवाह और अन्य घरेलू कार्यों को सम्पन्न किया जाता था।

इस समय गेहूं की फसल पूरी तरह से पककर तैयार होती है और किसान फसल की कटाई, मडाई, और भंडारण के लिए पूरे घर को तैयार करते हैं। पूरी प्रकृति अपने शबाब पर होती है। अगर आप ध्यान दें तो सम्पूर्ण भारत में इसी समय कई और त्योहार मनाए जाते है जो पूनल सावरी (प्राकृतिक नववर्ष) के ही आधुनिक स्वरूप है और भाषा, क्षेत्र के अनुसार विभिन्न विभिन्न नामों से पुकारे जाते हैं जबकि सब में मूल भावना एक ही है कि प्रकृति का स्वागत और प्रकृति के साथ चलने कि परंपरा का निर्वाहन और इन अन्य सभी त्योहारों के मनाने का तरीका भी काफी हद तक मिलता जुलता है।

नई फसल घर मे आने का समय भी यही है। इस समय प्रकृति मे उष्णता बढ्ने लगती है, जिससे पेड़ -पौधे, जीव-जन्तु मे नव जीवन आ जाता है। लोग इतने मदमस्त हो जाते है कि आनंद में मंगलमय गीत गुनगुनाने लगते है। नव वर्ष एक उत्सव की तरह पूरे भारत में अलग-अलग स्थानों पर तथा अलग अलग विधियों से मनाया जाता है। विभिन्न सम्प्रदायों के नव वर्ष समारोह भिन्न-भिन्न होते हैं और इसके महत्त्व की भी विभिन्न संस्कृतियों में परस्पर भिन्नता है। लेकिन इन विभिन्नताओं  के वावजूद पूनल सावरी का स्वरूप एक ही है क्यूंकी प्रकृति कभी बदलती नहीं, मानव भले ही उसे मनाने का अपना तरीका बदल ले।

चूंकि कोयतोड़ व्यवस्था में हर समय कि गणना चंद्रमा (नालेंज) के हिसाब से होती है और महीने की गणना अमावस्या से अमावस्या तक होती है जबकि इसके विपरीत हिन्दुओ के महीने की गणना पूर्णिमा से पूर्णिमा तक होती है और सूर्य पर आधारित होती है। पूनल सावरी के आधुनिक रूप जो भारत के विभिन्न हिस्सों में आज भी जीवित हैं और धूम धाम से मनाए जाते हैं जिसे आप नीचे दिये गए सूची में देख सकते हैं।

त्यौहार                            राज्य
गुड़ी परवा                     महाराष्ट्र
नवरेह                          जम्मू कश्मीर
वैशाखी                        पंजाब और हरियाणा
तिरुविजा                     तमिलनाडु
उगादी                         कर्नाटक, आंध्रप्रदेश
पोहेला बैशाखी             पश्चिम बंगाल
चेटी चंद                      गुजरात
नव संवत्सर                उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश बिहार

आज भी गोंडवाना क्षेत्र मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तेलंगाना, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश और झारखंड राज्यों के जन जातियों में पूनल सावरी को बड़े धूम धाम से मनाया जाता है। यह त्योहार मूलतया मातृ प्रधान त्योहार है जिनमें मातृ शक्तियों की मुख्य भूमिका होती है । महिलाएं ही इस त्योहार को मनाने में बढ़ चढ़कर भाग लेती हैं और पुरुष उनका साथ देते हैं।

अपनी संस्कृति और सभ्यता को आत्मसात करने और प्रकृति के साथ ताल में ताल मिला के चलने के कारण ही आज भी जनजातीय समाज अपनी संस्कृति और सभ्यता को सहेजने में सफल रहा है। कितनी भी विषम परिस्थियाँ रही हों कोईतोड़ समाज के लोग आज भी कोयामूरी द्वीप में अपनी उपस्थिति को बरकरार रखे हुए है और अपनी परम्पराओं और विरासतों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सौपते हुए आगे बढ़ रह है।

आइए हम सभी इस प्रकृतिक नव वर्ष यानि पूनल सावरी पर समस्त मानव जाति को पल्लवित और पुष्पित होने की कामना करें और प्रकृति का स्वागत और सेवामान करें । पूरे कोया विदार को बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाओं के साथ साथ सेवा-सेवा, सेवा जोहार !!

डॉ सूर्या बाली “सूरज धुर्वे”

यह लेख गोंडवाना समय अखबार में 6 अप्रैल 2019 को प्रकाशित हो चुका है

 

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