बृहत् छोटानागपुर के एक आदिवासी की संकल्पना

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Ganesh Manjhi

Ganesh Manjhi is a native of Simdega, Jharkhand. Currently he's a PhD scholar at Jawaharlal Nehru University, New Delhi.

गणेश मांझी, सिमडेगा, झारखण्ड से हैं और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में PhD शोधार्थी हैं. साथ ही अभी गार्गी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक शिक्षक के रूप में कार्यरत हैं.

आज से एक हज़ार साल पहले यानि लगभग 2014-15 की बात है, अमरीका मंगल ग्रह में कॉलोनी बनाने की बात कर रहा था और वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंन्स ने तीन चीजों से मानव सभ्यता के लिए खतरा बताया था, जैसे -कृत्रिम दिमाग (Artificial Intelligence), वैश्विक ऊष्मीकरण (Global Warming) और एलियन्स (aliens)। लगभग इसी दरम्यान, प्रसिद्द विचारक नोअम चोम्स्की ने कहा था कि – (Indigenous People “are the ones taking the lead in trying to protect all of us?”) मतलब आदिवासी ही एकमात्र लोग हैं जो कि हम सबों को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। ये समस्त सवाल जो लगभग 3000 साल पहले उठाये गए थे, काफी कुछ सत्य होता प्रतीत हो रहा है। आदिवासी के दर्शन में झांकेंगे तो पाएंगे – [‘Where are the saints in your society? We are all saints in this village. We have minimal needs, share what we have, and waste nothing’ (A Kondh tribe from ‘Out of this Earth’ by Das and Padel)] आपके समाज में संत कहाँ हैं? हमारे गाँव में हम सब संत हैं, आदिवासी जरूरतें सबसे कम हैं, हमारे पास जो भी है हम साझा करते हैं और कुछ भी बेकार में नष्ट नहीं करते हैं। सहअस्तित्व और साथ जीने की ये मिसाल आदिवासी दर्शन का एक महत्वपूर्ण अंग है, जो दिन-ब-दिन पूँजी और धर्म के धंधों से ह्रास होते जा रहा है और आदिवासी भी “गोरे व्यकि के बोझ” काले लोगों के प्रति वाले सिद्धांत जैसे व्यवहार करने लगे हैं। लगभग यही आसपास 2015 में कोलम्बस के मूर्ति को हटाकर जुआना अजुरडय की मूर्ति लगाई गयी, जिन्होंने अर्जेंटीना के स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। और ये कहा गया कि कोलंबस ने अमेरिका की खोज नहीं की बल्कि वो समुद्री यात्रा में खो गया था, जिसे वहां के आदिवासी समुदाय ने आश्रय दिया। इन तमाम सवालों में हम एक आदिवासी की संकल्पना ढूंढने की कोशिश करंगे। और हाँ ये संकल्पना भूत, भविष्य और वर्तमान को एक सटीक मगर काल्पनिक ढंग से देखता है।  

आज 9 अगस्त 3000 ई. है और आज आदिवासी जिस छोटे से द्वीप (पृथ्वी के अंदर) में रह रहे हैं। दर-असल हम गोलाकार पृथ्वी के भीतर बनाये गए सभ्यता को द्वीप कह रहे हैं। आज यहाँ से भविष्य को निहारना और योजना बनाना बहुत ही मुश्किल है, क्योंकि भागते-भागते आदिवासी ऐसे जगह पर अपनी सभ्यता विकसित कर रहे हैं, जहाँ से और भागना शायद मुश्किल है। क्योंकि ये जगह पृथ्वी के कोर के बाहरी हिस्से में है और शायद यहाँ से और अंदर जाना मुश्किल है। पृथ्वी के सतह से बाहरी कोर की दुरी लगभग 2500 कि.मी. है जो की पृथ्वी के भीतरी कोर और मैंटल के बीच में है। यहीं आदिवासी सभ्यता है और इसका नाम है बृहत् छोटानागपुर, जिसका विस्तार पृथ्वी के सतह से लेकर इसके गर्भ के बाहरी कोर तक है। आज से लभग 1000 हजार साल पहले छोटानागपुर में आदिवासियों के पूर्वज अपने मौखिक परंपरा को लिखित परम्परा में परिवर्तित कर रहे थे और इसी परिवर्तन और परावर्तन वाली अवस्था में किंकर्तव्यविमूढ़ स्थिति में बाजारवाद और समाजवाद की लड़ाइयां लड़ रहे थे और कभी जंगल के अधिकार की मांग कर रहे थे, तो कभी स्वतंत्र जीने का अधिकार तो कभी जमीन छीने जाने के अधिकार के खिलाफ मोर्चा निकाल रहे थे। परन्तु ये लड़ाईयाँ इतनी आसान नहीं थीं, बात थी अस्तित्व के लड़ाई की, ये लड़ाई थी उस छोटे से साम्राज्य की जो हमें सदियों से दाल रोटी देता आया था, वहीँ दूसरे ओर अजनबी (दिकू) लोग सामूहिकता की दाल रोटी को (KFC) के.ऍफ़.सी. के कृत्रिम मुर्गे में तब्दील करना चाह रहे थे।

वर्तमान में जो बृहत् छोटानागपुर है, वो बहुत सारे भौगोलिक परिवर्तनों से गुजरते हुए पृथ्वी के भीतर ही एक अलग सा ग्रह है, जिसमें कि जीवन की असीम संभावनाएं हैं और आगे भी सामूहिक रूप से बढ़ने की कूवत है। वास्तव में, ये सिर्फ भौगोलिक परिवर्तन नहीं बल्कि एक ऐतिहासिक, वैज्ञानिक और राजनीतिक परिवर्तन का नतीजा है। हजारों लाखों सालों के संघर्ष के बाद 2100 ई. में छोटानागपुर को स्वायत्ता दी गयी थी, जिसके तहत ये भारतीय गणराज्य में रहते हुए भी उनकी अपनी सामाजिक, प्रजातान्त्रिक व्यवस्था दी गयी थी। इस व्यवस्था में आदिवासियों ने अजनबियों (जिन्हें वे अक्सर दिकु के नाम से पुकारते थे) को शोषण रहित जीने खाने की आजादी दे रखी थी और बदले में शोषण रहित आपसी सम्बन्ध की चाह भी रखी थी। छोटनागपुर को ई.स. 2000 में एक अलग राज्य के रूप में भले स्वीकार किया गया परन्तु वो एक बड़े सपने का हिस्सा मात्र था, असली सपना तो स्वायत्तशासी आदिवासी साम्राज्य की व्यवस्था थी, जिसको मिलने 100 साल और लगे। ई.स. 2000 के पहले भी काफी लड़ाइयाँ लड़ी गयी और आदिवासी के पूर्वजों ने काफी कुर्बानियाँ दी थीं, तब जाकर छोटानागपुर राज्य का निर्माण हुआ था। दर-असल छोटानागपुर के भौगोलिक, राजनीतिक निर्माण की शुरुवात पेंजिया महाद्वीप से कर सकते हैं, परन्तु अहम दस्तावेज और सबूत हड़प्पा और मोहनजोदड़ो से शुरू होती है। उसके बाद तो जैसे आक्रमणकारियों के साथ ही संघर्ष के साथ जीवन बीतता रहा, और आदिवासी अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए लड़ते गए और सुरक्षित जगहों पर सभ्यता विकसित करते गए। जब हड़प्पा संस्कृति पर भी अजनबियों का आक्रमण हुआ तब ये सभ्यता लगभग तहस नहस हो गया। इसके बाद दक्कन, हिमालय और छोटानागपुर के इलाके ही सुरक्षित थे। छोटानागपुर, सबसे सुरक्षित जगहों में से एक माना जाता था। लेकिन फिर भी अजनबियों के आक्रमण नहीं रुके और आदिवासी अपने आप को बचाते रहे। एक समय ऐसी स्थिति भी आई की आदिवासी संख्या गिनती के रह गए थे। फिर अदिवासियों ने वर्तमान तकनिकी और जीने के गुर सीखे जिसका इस्तेमाल अक्सर अजनबी किया करते थे, फिर आदिवासी तकनिकी रूप से अपने आप को बचाने के लिए गुर सीखने लगे। धनुष के जगह पर उन्होंने तकनिकी का इश्तेमाल करना शुरू किया, अपना इतिहास और साहित्य लिखने लगे, फिर क्या था, आने वाली नस्लें बौद्धिक रूप से ज्यादा मजबूत और शक्तिशाली होते चले गए। अभी ई. स. 3000 को, कम-से-कम स्थिति ये है कि आदिवासी अपने आप को तमाम किस्म के आक्रमणों से बचा सकते है/ वास्तव में वक़्त के थपेड़ों ने गुरिल्ला लड़ाई को सिर्फ ऐतिहासिक और काको-आजी की कहानी मात्र बना गयी थी। 

दर-असल, मनुष्यों की घुमन्तु और झूम प्रवृति ने पृथ्वी को रहने लायक नहीं छोड़ा था, और आज ई.स. 3000 तक समस्त पृथ्वी उजाड़ पड़ा हुआ था, कहीं कूड़े के ढेर हैं, तो कहीं नदियां जहरीले पानी फ़ेंक रहे हैं, कहीं यूरेनियम के रेडिएशन तो कहीं रेगिस्तान का निर्माण। सम्पूर्ण पृथ्वी को देखा जाये तो, सिर्फ बृहत् छोटानागपुर ही ऐसी जगह बची थी, जहाँ पर जिंदगी संभव है। वस्तुतः, आदिवासी तथाकथित मुख्यधारा की बात करते-करते और उनके शिक्षा पद्धति से पढ़ते-पढ़ते इतनी चीजें जरुर समझने लगे थे कि, तकनिकी ज्ञान क्या है और इसे पर्यावरण के साथ सामंजस्य बना के कैसे रहा जा सकता है और इस प्रकार उन्होंने अपनी सभ्यता खुद विकसित की, लेकिन हाँ, उन्हें पलायन बर्दास्त नहीं था। यही वजह थी कि आदिवासियों ने यथा स्थिति में रहकर भी अपनी सभ्यता को पृथ्वी के सतह से अंदर ले जाना स्वीकार किया। दूसरे लोग तकनिकी में इतने पारंगत थे कि वे लोग कबाड़ बने पृथ्वी को छोड़कर दूसरे ग्रह में जाने की तैयारी कर रहे थे, ठीक उसी तरह जिस तरह झूम खेती की जाती थी। जब ई.स. 2500 के आसपास ध्रुवीय बर्फ लगभग पिघल चुके थे, समंदर का जल-स्तर काफी बढ़ गया था, लोगों को रहने के लिए नए ठिकाने ढूंढने पड़ रहे थे। कबाड़ बने पृथ्वी, जलप्लावन की समस्या और भूमिगत जल का अथाह दोहन जीवन की सम्भावना को निम्न कर दिया था। इसी बीच, तकनिकी रूप से सक्षम देश नए ग्रहों में जीवन तलाश कर पलायन की तैयारी करने लगे, इसी दरम्यान चीन ने 2850 ई. में एक नए ग्रह की खोज की जिसका नाम “हुफो” रखा गया, जो कि लगभग पृथ्वी के साइज का आधा था। फिर क्या था, विश्व के सारे देशों में पलायन की होड़ शुरू हो गयी। सभी लोगों को उस नए ग्रह में कॉलोनी बसाने की जगह चाहिए थी, ठीक उसी तरह जिस तरह, यूरोप के देशों ने हजारों साल पहले चीन को ग़ुलाम बना के, खरबूजे की तरह काट दिया था। एक खास बात ये है कि 2800 ई के आस पास में, विश्व की जनसँख्या भी काफी घट गयी थी क्योंकि, प्रकृति से खिलवाड़ की वजह से आपदाओं में अचानक वृद्धि हो गयी थी, इसके बावजूद तकनिकी रूप से सक्ष्म और धनाढ्य लोगों की एक बड़ी फ़ौज थी जो “हुफो” में बसना चाहती थी और ये लोग धीरे-धीरे “हुफो” में पलायन करने लगे/ क्योंकि आदिवासियों ने हमेशा से ही तकनिकी और पर्यावरण के साथ सामंजस्य बना के आगे बढ़ने की कोशिश की, इनलोगों के पास इतने सम्पति भी नहीं थे कि ये “हुफो” में जाने की हिमाकत करें। फलतः, आदिवासियों ने जीवनपर्यन्त अपने जमीन से जुड़े रहने का प्रण किया और पृथ्वी को फिर से पुनरुद्धार और हरा-भरा करने की ठानी।

आये दिन आतताइयों (दिकुओं) का प्रकोप लगा रहता है इसलिए आदिवासियों ने अपने सुरक्षा तकनीक खुद विकसित कर ली थी, और मुख़्य सुरक्षा प्रणाली थी, कंप्यूटर के द्वारा हैकिंग। वास्तव में, लगभग 2800 के आसपास अजनबी लोग दुबारा अपने वायुयान पृथ्वी पर भेजने लगे, शायद ये जांच करने के लिए कि, पृथ्वी पर जीवन सम्भावना फिर से बेहतर हो गयी हो, लेकिन जैसे ही कोई अजनबी उड़नतस्तरी पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में आता था, उसका नेटवक सिस्टम आदिवासियों के सुरक्षा प्रणाली में हैक हो जाता था, फिर आदिवासियों की सुरक्षा प्रणाली उनके सिस्टम को बर्बाद कर देता था।  इसकी वजह से, या तो आक्रमणकारी लौट जाते थे या आसमान में ही नष्ट हो जाते थे। फिर भी आदिवासियों को डर है कि, जिस दिन ये पृथ्वी पूरी तरह से फिर हरा भरा हो जायेगा, उस दिन ये झूम प्रवृति वाले लोग फिर शक्तिशाली रूप से वापस आएंगे और शायद आक्रमण भी करेंगे। लेकिन आदिवासी उसके लिए तैयार हैं और लड़ाई जारी है। आएँ अब 3000 इ. में आखरी बची हुई बृहत् छोटानागपुर को अजनबियों से बचाएं, खासकर “हुफो” से।

(नोट: इस घटना का वास्तविक जीवन से सम्बन्ध हो सकता है।) 


Picture: Manjhi Ganesh

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Ganesh Manjhi is a native of Simdega, Jharkhand. Currently he's a PhD scholar at Jawaharlal Nehru University, New Delhi. गणेश मांझी, सिमडेगा, झारखण्ड से हैं और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में PhD शोधार्थी हैं. साथ ही अभी गार्गी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक शिक्षक के रूप में कार्यरत हैं.

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