बच्छराज कुंवर: छत्तीसगढ़ में आदिवासी देवता के ब्राह्मणीकरण का समाज कर रहा विरोध

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Jitendra Sonu Maravi

जितेन्द्र सोनू मरावी "रूद्र" छत्तीसगढ़ - सरगुजाके सुरजपुर के रहने वाले हैं। बहुत ही कम उम्र में समाजसेवा मे लग कर आदिवासीयों के हक अधिकार के लिए आंदोलन खडा कर लडते आये हैं। वर्तमान में सोनू बीए सेकेण्ड ईयर के विद्यार्थी हैं। समाज सेवा के साथ साथ लेखनी में भी हाथ आजमाते रहते हैं।

छत्‍तीसगढ़ के घने जंगल प्राचीन दुनिया से जुड़े कई गहरे इतिहास संजोये हुए हैं। ऐसा ही एक इतिहास है उत्तर छत्तीसगढ़ के बलरामपुर-रामानुजगंज जिले में स्‍थित जोबा पहाड़ियों पर। जिले के वाड्रफनगर इलाके के घने जंगलों के बीच स्‍थित, तकरीबन एक हजार फुट ऊंची इस पहाड़ी पर किसी प्राचीन शहर के पुरावशेष बिखरे पड़े हैं। पूरी तरह से खंडहर में तब्‍दील हो चुके इस प्राचीन स्थल का इतिहास आज भी गुमनाम है। ये किसका था और इसे किसने बसाया इसके बारे में सही जानकारी पुरातत्‍वशास्‍त्रियों को भी नहीं है। हालांकि, आदिवासी किंवदंतियों में इस शहर के निर्माण का श्रेय बच्‍छराज कुंवर को दिया जाता है। 

दरअसल बच्छराज कुंवर को स्‍थानीय आदिवासी स्‍वयंभू देवता मानते हैं। मानपुर ग्राम के ग्रामीणों में प्रचलित एक किंवदंती के अनुसार, हजारों वर्ष पहले इस इलाके में एक वीर योद्धा और महान प्रतापी राजा बच्‍छराज यहां शासन करते थे। एक दिन आकाशीय देवताओं ने घोषणा की कि जो भी राजा अपनी रानी के साथ मिलकर, जोबा की पहाड़ी पर एक ही रात में महल बनाकर दरवाजे पर दीपक जलाएगा, उसे महान सुख, समृद्धि और यश की प्राप्‍ति होगी। इस कठिन चुनौती को आखिरकार शूरवीर राजा बच्‍छराज ने स्‍वीकार कर लिया और चंदौरा की रूपवती राजकुमारी को भगाकर उससे गंधर्व विवाह किया और शाम होते-होते इस पहाड़ी पर पहुंच गये। यहां पहुंचकर राजा बच्‍छराज कुंवर ने पत्‍नी संग यहां महल निर्माण का कार्य शुरू किया। वहीं राजकुमारी को भगाने से नाराज चंदौरा के राजा ने भी बच्‍छराज से युद्ध के लिए अपने सैनिकों को जोबा की पहाड़ी के लिए रवाना किया। कहते हैं कि बच्‍छराज कुंवर का प्रधान रक्षक एक विशालकाय सर्प था। जब चंदौरा के सैनिक बच्‍छराज कुंवर से युद्ध करने वहां पहुंचे तो सबसे पहले उनका सामना उसी विशालकाय सर्प से हुआ। हालांकि सैनिकों ने सर्प को दूध आदि खिलाकर धोखे से मार डाला। सर्प के मरते ही बच्‍छराज और चंदौरा के सैनिकों में भीषण जंग छिड़ गई, इसी बीच सुबह हुई और महल निर्माण का कार्य अधूरा रह गया। वहीं देवताओं की शर्त के अनुसार सुबह की पहली किरण पर महल ना बनने के कारण उस पर्वत पर मौजूद राजा-रानी सहित चंदौरा के सभी सैनिक भी पत्‍थर के बन गए। बाद में उस स्‍थान पर आए चंदौरा के अन्‍य सैनिकों ने पत्‍थर की मूर्ति बने राजा-रानी के हाथ, पांव, नाक एवं कान काटकर अपने राजा के पास ले गये। किवदंतियों के अनुसार आज भी ये सभी दृश्‍य यहां बिखरे पुरावशेषों में ढूंढे जा सकते हैं।

अगर आप कभी जोबा पहाड़ी पर जाएं तो यहां तक पहुंचने वाला रास्‍ता काफी दुर्लभ है। विशाल चट्टानों के बीच से होकर गुजरने वाले मात्र दो फुट चौड़े रास्‍ते के जरिए ही यहां पहुंचा जा सकता है। इस दुर्गम रास्ते से ऊपर पहुंचने पर समतल पाट मिलता है जिसके दाईं और बाईं तरफ समतल पाट पर पत्‍थर की सुरंगे बनी हुई हैं। माना जाता है कि इन सुरंगों को रक्षकों के छिपने की जगह के रूप में बनाया गया होगा। दुर्गम चढ़ाईदार पहाड़ी के उपर पत्थरों की मजबूत दीवार वृत्ताकार रूप में यहां आज भी दिखाई देते है। बच्छराज कुंवर की प्रतिमा के समीप ही एक दुधिया रंग के स्वच्‍छ जल का नाला बहता है। इस नाले के समीम काफी प्राचीन खण्डहर एवं पुरातात्विक अवशेष मिलते हैं। इन खण्डहरों में खांचेदार पत्थर भी देखने को मिलते हैं। मानते हैं कि इन पत्थरों को आपस में जोड़ने के लिए ही खांचे बनाए गए होंगे। यहीं पर कफी प्राचीन ईंटे भी बिखरी हुई हैं। स्थानीय लोग उन्हें संरक्षक योद्धा के रूप मे पूजते हैं। श्रद्धालुओं में बच्छराज कुंवर के प्रति काफी आस्था है। इसके अलावा यहां बकरे की बलि देने का भी रिवाज है।

“आदिवासियों के पारम्परिक धार्मिक स्थलों पर कब्जा कर उनकी रूढिगत चली आ रही परम्परा, बैगा-पुजारीयों को हटाकर ब्राह्मण पुजारी स्थापित कर वहां वैदिक धार्मिक दुकान खोलने की साज़िश कि जा रही है । बडी हैरत होती है की सरकार अनुसुची क्षेत्रों में आदिवासीयों के पारम्परिक स्थलों को ट्रस्ट बनाकर उन्हें वहां से हटाने व उनकी मान्यताओं से कैसे खिलवाड कर सकती है!”

इतिहासकारों के अनुसार यहां स्थित वास्तु-कला 8वीं से 10वीं शताब्‍दी के डीपाडीह शिल्‍पकला से मिलती-जुलती हैं। जैसा कि ज्ञात है, मोतीरावण कंगाली अपनी किताब “गोंड वासियों का मूल निवास स्थल” में लिखते हैं कि इसी जिले के सामरी क्षेत्र में स्थित, डीपाडीह “सामरी सिंह” के अधीन एक पुराना गोंड साम्राज्य था, उनके किले के खंडहर अभी भी डीपाडीह गाँव में पाए जा सकते हैं। हाल ही में हुई पहाड़ियों की खुदाई से 40 खानों की खोज हुई है, जो गोंड साम्राज्य से संबंधित हैं। 

हिन्दू धर्म द्वारा बच्‍छराज कुंवर के एप्रोप्रिएशन या विनियोग का इतिहास लगभग 70 साल पुराना है. सन 1951 के आते तक सरगुजा क्षेत्र में राजमोहिनी देवी के नेतृत्व में एक आंदोलन शुरू हो चुका था. यह कांग्रेस पार्टी द्वारा समर्थित था, जिसमे हिंदू धर्म, राष्ट्रवाद और गांधीवादी विचारधारा का प्रचार किया गया। राजमोहिनी देवी आंदोलन ने महुआ की शराब पर पाबंदी का आहवाहन किया, मांस का त्याग करना, गाय की पूजा करना, अहिंसा का पालन करना और महात्मा गांधी आदि की शिक्षाओं का पालन करना आदि का प्रचार प्रसार किया गया। आंदोलन के दौरान, ग्राम के देवताओं को “शुद्ध” करने और उन्हें भगत बनाने का भी प्रयास हुआ—इस प्रकार गाँवों के बाद गाँवों में हिन्दू धर्म का प्रचार प्रसार किया गया।

इस विषय पर शोधकर्ता विलियम एक्का अपने रिसर्च पेपर —राजमोहिनी देवी का सुधार आंदोलन —में लिखते हैं,

“ऐसा माना जाता है कि [आदिवासियों के] देवता, उन्हें सूअर, बकरी, मुर्गी या शराब [हड़िया] जैसी चीजें अर्पित करने  पर अपने भक्तों की मनोकामनाओं को पूरा करते हैं। मई 1976 में एक दिन, वह [राजमोहिनी देवी] अपने अनुयायियों के साथ [बच्छराज कुंवर के स्थल] गई और उन्होंने उस स्थान की सफाई की और लोगों को किसी भी जानवर की बलि देने और उसे शराब चढ़ाने से रोक दिया। उसने देवता के बैगा (गोंड पुजारी) से कहा कि वह बछराज कुंवर को भगत बनाकर [अनुयायी] उसे स्नान कराएगा, इस माथे पर सिंदूर का टीका लगाएगा और उस पर एक जनेऊ (पवित्र धागा) डालेगा। चूँकि उनके भगवान भगत बन गए थे, बैगा ने उनका अनुसरण किया और भगत बन गए। इस घटना के कारण बड़ी संख्या में लोग भगत बन गए।” (एक्का 1983: 217)

इस तरह आने वाले वर्षों में आदिवासियों के इस पारम्परिक गढ़ के बैगाओं (गोंड समुदाय के पुजारी) और वहां के पारम्परिक पूजा पद्धति को, व पारंपरिक गढ़ देवता के स्थल को ब्राह्मणवादी लोगों की साज़िश ने वहाँ बड़े-बड़े वैदिक धर्म के मंदिर में बदल दिया है और वैदिक धर्म के भगवानों की विशालकाय मूर्तियाँ स्थापित कर दी गयी है। इस तरह बैगा पूजा पद्धति को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है, इसके पीछे गैर-जनजाति व्यापारिक सोंच वाले लोगों का हाथ है. ठीक इसी प्रकार के सोच वालों नें छत्तीसगढ़ के रतनपुर महामाई को महामाया बना कर, बैगा को हटाकर वैदिक धर्म स्थल में बदल दिया, कोरबा के सरमंगला, मैहर के हिगलाजिनी, डोंगरगढ़ के समलाई, संबलपुर संमलाई को आदि जो आदिवासी देशज समुदायों के पारंपरिक गढ़माई थे, उनमें हेर-फेर कर वैदिक धर्म स्थल में बदल दिया गया। वही लोग अब कुदरगढ़, बच्छराज कुंवर पर नजर डाले हैं।

“ब्राह्मणवादी ,बनिया बुद्धि वाला न्यास नहीं बनेगा ,नहीं बनेगा!” का नारा भी दिया है. इसका कारण यह कि यह 5 वीं अनुसूचित क्षेत्र है। दूसरा उक्त समिति द्वारा उस आदिवासी देव स्थल को वैदिक धर्म स्थल में बदलने का साजिश कर रहा है।

इसी विषय में 29 जुलाई को वाड्रफनगर के अनु-विभागीय अधिकारी ने एक इश्तिहार जारी किया, जिसमें लिखा गया कि “सर्वसाधारण जनता ग्राम मानपुर एवं अनुभाग वाड्रफनगर जिला बलरामपुर-रामानुजगंज को सूचित किया जाता है कि बाबा बच्छराज कुंवर विकास समिति, ग्राम मानपुर द्वारा बाबा बच्छराज कुंवर धाम को ट्रस्ट बनाने हेतु न्यास अधिनियम 1951 संशोधित 1962 की धारा 4 (1) के अंतर्गत आवेदन प्रस्तुत किया गया है, जो इस न्यायलय में लंबित है.” 

दरअसल, ग्राम कछिया के राजकुमार गुप्ता द्वारा वहाँ “बाबा बच्छराज कुंवर विकास समिति मानपुर” का संचालन किया जा रहा है. और इन्ही गैर-आदिवासियों ने उस समिति को ट्रस्ट बनाने के लिए आवेदन दिया है। आवेदन के बाद से आदिवासी समुदाय व बैगा लोग इसे ट्रस्ट बनाने का विरोध कर रहे हैं. इस संबंध में पारंपरिक आदिवासी महासभा व सर्व आदिवासी समाज, वाड्रफनगर सहित 50 से अधिक गाँव के लोगों के द्वारा ट्रस्ट व समिति दोनों को रद्द करने का प्रस्ताव पारित कर एस डी एम को ज्ञापन दिया गया है कि आदिवासिओं के “पारंपरिक आदिवासी महासभा द्वारा प्रस्तावित न्यास बनना चाहिए”। “ब्राह्मणवादी ,बनिया बुद्धि वाला न्यास नहीं बनेगा ,नहीं बनेगा!” का नारा भी दिया है. इसका कारण यह कि यह 5 वीं अनुसूचित क्षेत्र है। दूसरा उक्त समिति द्वारा उस आदिवासी देव स्थल को वैदिक धर्म स्थल में बदलने का साजिश कर रहा है।

हालाँकि एस डी एम को लिखित ज्ञापन देने के बावज़ूद भी उन पर अभी तक कार्यवाही नहीं हुई है, बल्कि दावा आपत्ति मंगाया जा रहा है। यह अनुसूचित क्षेत्र में गैर आदिवासियों की तानाशाही का एक उदहारण है. बच्छराजकुंवर  आदिवासी पूर्वजों का गढ़ है और उस पर सिर्फ आदिवासियों का हक़ है। और आदिवासी अपने पूर्वजों के सांस्कृतिक व ऐतिहासिक पहचान के लिए लड़ रहे हैं, विरोध कर रहे हैं। क्षेत्र में आदिवासीयों के संस्कृति संरक्षण पर काम करने वाले डाॅ नारवेन कासव टेकाम कहते हैं कि, “आदिवासियों के पारम्परिक धार्मिक स्थलों पर कब्जा कर उनकी रूढिगत चली आ रही परम्परा, बैगा-पुजारीयों को हटाकर ब्राह्मण पुजारी स्थापित कर वहां वैदिक धार्मिक दुकान खोलने की साज़िश की जा रही है । बडी हैरत होती है की सरकार अनुसुची क्षेत्रों में आदिवासीयों के पारम्परिक स्थलों को ट्रस्ट बनाकर उन्हें वहां से हटाने व उनकी मान्यताओं से कैसे खिलवाड कर सकती है!”


सन्दर्भ सूची:

  • Ekka, William. 1983. Reform Movement of Rajmohini Devi. In K.S. Singh (ed.), Tribal Movements in India, Volume II, Delhi: Manohar, pp. 209-23.
  • Kangali, Motiravan (1983), Gond Vasiyon Ka Mul Niwas Sthal, (Nagpur: Tirumay Chitralekha Kangali Publications).

 

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जितेन्द्र सोनू मरावी "रूद्र" छत्तीसगढ़ - सरगुजा के सुरजपुर के रहने वाले हैं। बहुत ही कम उम्र में समाजसेवा मे लग कर आदिवासीयों के हक अधिकार के लिए आंदोलन खडा कर लडते आये हैं। वर्तमान में सोनू बीए सेकेण्ड ईयर के विद्यार्थी हैं। समाज सेवा के साथ साथ लेखनी में भी हाथ आजमाते रहते हैं।

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