पलायन और मानव तस्करी का मनोविज्ञान और अर्थशास्त्र

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Ganesh Manjhi

Ganesh Manjhi is a native of Simdega, Jharkhand. Currently he's a PhD scholar at Jawaharlal Nehru University, New Delhi.

गणेश मांझी, सिमडेगा, झारखण्ड से हैं और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में PhD शोधार्थी हैं. साथ ही अभी गार्गी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक शिक्षक के रूप में कार्यरत हैं.

ऐतिहासिक रूप से देखा गया है की मनुष्य हमेशा से ही प्राकृतिक और भौगोलिक रूप से मुश्किल इलाकों से आसान इलाकों में पलायन करते गया है| पलायन करने के सबसे महत्वपूर्ण कारणों में जिन्दा रहना और सहज जिंदगी जीने की कोशिश सबसे महत्वपूर्ण है| जिंदगी की इन्ही जदो-जहद में नयी चीजों का ईजाद होता है, जीवन के नए पद्धति अपनाये जाते हैं, कुछ चीजें पुरानी और बेकार समझी जाती हैं, और बेकार समझी जाने वाली चीजें जिंदगी के अहम् हिस्से बन जाते हैं, कुछ लोग नदियों, पहाड़ों, जंगलों, खेत, खलिहान को ही जीवन समझते हैं और कुछ शहर की ओर पलायन करते हैं शायद बेहतर जीवन की तलाश में| इसी भूत और भविष्य के बीच वर्तमान में मानव जीता है और तमाम किस्म की चीजों को उत्पन्न करता है ताकि वो जीवन को आसान बना सकें|

मानव द्वारा बनाये गए तमाम व्यवस्था में बाजार एक महत्वपूर्ण व्यवस्था है| अगर वर्तमान बाजार व्यवस्था की बात की जाये तो इतना समझ लीजिये की पृथ्वी की हर चीज वस्तु है और हर वस्तु का सौदा संभव है, जैसे आलू का सौदा, शकरकंद का सौदा, कृषि का उद्योग और सेवा के साथ सौदा, शहर का गांव के साथ सौदा, सोच का सौदा, अपनी हंसी का सौदा, बेटी बहनें और बच्चों का सौदा, गुर्दे, आँख और शरीर के विभिन्न अंगों तक का सौदा| वर्तमान बाजार व्यवस्था में मनुष्य अपने चेतन मन से निर्णीत सबसे शुद्ध फायदेमंद चीज का चुनाव और उपभोग करता है| इन तमाम चीजों में पलायन और मानव तस्करी का बाजार बहुत से पिछड़े राज्य झेल रहे हैं और इनमे 2000 में नवोदित राज्य झारखण्ड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड प्रमुख हैं| पलायन और तस्करी के दृष्टिकोण से इन तीन राज्यों में झारखण्ड सबसे आगे है, फिर छत्तीसगढ़ और फिर उत्तराखंड| ये तीनों राज्य आर्थिक दृष्टिकोण से अगर ठीक कर भी रहे हैं तो कम-से-कम इतना तो निश्चित है की ये पलायन और तस्करी रोकने में असफल रहे हैं या यूं कहें की ये आर्थिक विकास के दुष्परिणाम हैं तो अतिशयोक्ति नहीं होगी|

कुछ सपने शहर में वृद्ध दम्पतियों (जिनके बच्चे अमरीका में डॉलर छाप रहे हैं) की इतनी सेवा कर जातीं हैं  कि वो किसी बड़ी हवेली में फ्लैट के वारिस भी हो जाते हैं, कुछ को पूरी सम्पति फैक्ट्री सहित मिल जाती है, कुछ अपनी जिंदगी बचाने के लिए छत से कूद जाती हैं, कुछ दिल्ली के मुख्य सड़क पर कूदकर भागने की कोशिश करती हैं, कुछ के शरीर के टुकड़े-टुकड़े नाले में मिलते हैं, कुछ सिर्फ मुंडा और खड़िया ही बोल पातीं हैं बावजूद इसके दिल्ली के सपने देखती हैं..

उपरोक्त लेख में हम पलायन के बहाने नाबालिग लड़के-लड़कियों के होने वाले सौदे के बारे में विश्लेषण करना चाहते हैं| पलायन और तस्करी के आर्थिक और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण को काफी चिंतकों द्वारा समझने का प्रयास भी किया गया है, सख्त कानून भी बनाये गए हैं लेकिन स्थिति बदतर ही होती रही| अभी की बाजार व्यवस्था को सूचना क्रांति ने कंप्यूटर और मोबाइल फ़ोन में सीमित कर दिया है वस्तुतः बाजार द्वारा उत्पन्न नकारात्मक शक्तियों को समझ पाना इतना आसान नहीं है| पहले सिर्फ रास्ता चलते डर लगता था अब इंटरनेट में घुसने में डर लगता है कहीं आपके विचारों और कहीं आप ही का व्यापार तो नहीं हो रहा है? खैर, पलायन और तस्करी के अर्थशास्त्र को समझने के लिए अर्थशास्त्र पढ़ने की जरुरत नहीं है| शहर की ओर खिंचाव और गांव से धक्काव के बहुत सारे कारण है जिसे हर कोई आसानी से समझ सकता है जैसे की पहली अवस्था में — अवसर और आधुनिक सुविधाओं की पर्याप्तता, बेहतर जीवन की सम्भावना इत्यादि, वहीँ पर दूसरी अवस्था में — अवसर की कमी, शिक्षा के प्रति उदासीनता और माध्यमिक शिक्षा में अत्यधिक असफलता प्रमुख हैं| दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे बड़े शहरों में चमक-दमक और नियोन लाइट की दुनिया किसे आकर्षित नहीं करती है और एक लड़की जब किसी तरह इन शहरों में पहुँच जाती है तो घर की हर अगली ट्रिप में 2-4 और सपनों को शहर ले आती है| कुछ अगर अच्छे घरों में जम गए तो अपने छोटे भाइयों और बहनों के शिक्षा का खर्च और परिवार का जीवन बेहतर करने में लगा देती हैं| घर के मुखिया जो अक्सर अपने नाबालिग बच्चे-बच्चियों के कमाई से बोतल (शराब) का दम्भ लेकर गांव में कुलाचें मारते हैं उनका जीवन रसमय हो जाता है और इस बेफिक्री में बच्चे शहर में ग़ायब भी हो जाएँ तो शायद उन्हें तनिक भी तकलीफ नहीं होती है| एक बार शहर होकर लौटी हुई सपना बाकी लोगों को शहर के बेहतर जीवन के सपने दिखाती है और अपने साथ ले आतीं हैं और अक्सर वापस कभी नहीं जा पाती है| अक्सर, शहर आने के बाद एक बार घर लौटना साधारण बात है, वो इसलिए भी की गांवों में किसी को भी इसके बारे में संदेह न हो की वो भी भविष्य में शहर में ग़ायब हो सकती है (कैसिनो के खेल की तरह पहले जीतोगे लेकिन अंततः हार कर ही लौटोगे या बिक जाओगे)| धीरे-धीरे लौटना मुश्किल होता चला जाता है और कुछ हमेशा के लिए लौट नहीं पाते हैं| कुछ सपने शहर में वृद्ध दम्पतियों (जिनके बच्चे अमरीका में डॉलर छाप रहे हैं) की इतनी सेवा कर जातीं हैं  कि वो किसी बड़ी हवेली में फ्लैट के वारिस भी हो जाते हैं, कुछ को पूरी सम्पति फैक्ट्री सहित मिल जाती है, कुछ अपनी जिंदगी बचाने के लिए छत से कूद जाती हैं, कुछ दिल्ली के मुख्य सड़क पर कूदकर भागने की कोशिश करती हैं, कुछ के शरीर के टुकड़े-टुकड़े नाले में मिलते हैं, कुछ सिर्फ मुंडा और खड़िया ही बोल पातीं हैं बावजूद इसके दिल्ली के सपने देखती हैं| कुछ शहर में फैशनेबल माताओं के लिए किराये की कोख बनती हैं, कुछ किसी के शारीरिक सुख के लिए और चंद पैसों के लिए बड़े हवेलियों के गिरफ्त में रहती हैं| झारखण्ड और छत्तीसगढ़ की लड़कियों का सौदा हरियाणा और पंजाब में भी किया जाता है जहाँ एक ही घर के 4-5 भाई एक ही खरीदी गयी लड़की से शादी करते हैं (खास वजह ये हो सकती है की हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में पुरुषों की तुलना में लड़की लोगों की संख्या काफी कम है जबकि झारखण्ड और छतीशगढ़ खासकर अनुसूचित इलाकों में इसके उलट है)| एक लड़की भागने के उपाय ही नहीं ढूंढ पाने और बच्चे को असहाय घर पर न छोड़कर जाने की अवस्था में घर से ही बच्चे को लेकर दिल्ली से राउरकेला से होते हुए सिमडेगा (झारखण्ड) पहुँच जाती है फिर उसे बच्चा तस्कर कहकर गिरफ्तार कर लिया जाता है|

बहुधा एन.जी.ओ., प्रशासन और तस्करों की सांठ-गांठ भी बीच-बीच में नजर आती है|  कभी कभी ऐसा लगता है एन.जी.ओ. वाले ग़ायब व्यक्ति को खोज कर लाने और फंसे व्यक्ति को छुड़ा कर लाने का दावा करते हैं एवज में पैसे भी मांगते हैं; वहीं दूसरी ओर जहाँ से छुड़ा के लाया जाता है उधर से भी कमाई की गुंजाईश रहती है, और एन.जी.ओ. के नाम पर सरकार तो फण्ड देती ही है| कुल मिलाकर जो व्यक्ति काम करने शहर में जाने में दलालों के चंगुल में आ जाता है उसे छोड़कर इस धंधे में सब मालामाल हैं| ऐसी स्थिति में किसी पर किसी ग्रामीण का भरोसा करना मुश्किल हो गया है|                          

अभी का युवा हर चीज जल्दी पाना चाहता है, धैर्य की कमी है और ग्रामीण परिवेश में हमेशा रहने की वजह से शायद शहर चमक से जल्दी आकर्षित होती है|  दूसरी बात, सरकार का इसमें कोई सार्थक प्रयास नहीं दिखता है|

विश्व में जिस्म और शारीरिक अंगों का व्यापार इतना बड़ा है की इसका सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है तथ्य नहीं जमा कर सकते, क्यूंकि ये सब अर्थशास्त्र के काले हिस्से हैं जिसका लेखा-जोखा फिलहाल तक संभव नहीं हो पाया है| कुछ रिपोर्टों की मानें तो मानव अंगों का व्यापार भारत के बड़े शहरों में ही नहीं मध्य-पूर्व के देशों में भी कुली और मजदूरी करने गए लोगों का किया जाता है| जाहिर है की तस्करी का जाल पूरे विश्व में है| कुछ अख़बारों और रिपोर्टों की मानें तो, झारखण्ड और छतीशगढ के भोले-भाले आदिवासियों की मांग विदेशों में भी काफी ज्यादा है, पहला, क्यूंकि ये ईमानदारऔर अंतर्मुखी होते हैं, दूसरा, इन लोगों में एड्स का प्रकोप कम है| इसी प्रकार अनेकानेक उदहारण हैं| अमर्त्य सेन और ज्याँ द्रेज की मानें तो भारत में लगभग 3 करोड़ 70 लाख महिलाओं को पैदा ही नहीं होने दिया ग़या है और पैदा होने के बाद ग़ायब लोगों की संख्या मिला दें तो दुगुने के करीब जरूर पहुँच जायेगा| पैदा होने के बाद तस्करी के द्वारा झारखण्ड और छतीशगढ़ से ग़ायब होने वाले लोगों की तादाद लाखों में हैं अब महत्वपूर्ण सवाल ये है की समस्या तो इतने सारे हैं तो इनका समाधान कैसे संभव है?

इसका वास्तविक समाधान जमीन पर ही संभव है कागजों पर नहीं| वैसे जब कभी भी किसी भी पलायन करने वाली लड़की से अगर बात की जाये तो जवाब मिलता है की आप ही मेरा खर्चा चला दीजिये| इससे दो चीजें साफ़ झलकती हैं — अभी का युवा हर चीज जल्दी पाना चाहता है, धैर्य की कमी है और ग्रामीण परिवेश में हमेशा रहने की वजह से शायद शहर चमक से जल्दी आकर्षित होती हैं|  दूसरी बात, सरकार का इसमें कोई सार्थक प्रयास नहीं दिखता है| भारतीय गणतंत्र में वैसे भी कृषि सिकुड़ता जा रहा है और कृषि से बेरोजगार हुए लोगों को सस्ते मजदूर की तरह शहरी विकास में और उद्योग धंधों में लगाया जा रहा है ताकि इनकी आये बढ़ सके| नवोदित राज्यों में उत्तराखंड शायद दिल्ली जैसे शहर के नजदीक में रहने की वजह से राज्य के मजदूरों की बढ़ती आय का ज्यादा फायदा ले पाया है परन्तु झारखण्ड और छतीशगढ़ की स्थिति में परिवर्तन नगण्य ही है| दूसरे ओर कृषि आय में शायद ही कोई वृध्दि है क्यूँकि कुछ सालों से झारखण्ड सुखाड़ झेल रहा है, इस मामले में छत्तीसगढ़ थोड़ा बेहतर माना जा सकता है|

जाहिर है, पहला समाधान खिंचाव और धक्काव विश्लेषण के द्वारा राज्यों में ज्यादा-से-ज्यादा अवसर उपलब्ध कराये जाने चाहिए, कृषि के साथ-साथ उद्योग धंधों में रोजगार सृजन की व्यवस्था, छोटे बांधों द्वारा सिंचाई की सुविधा, ग्रामीण कौशल योजना के तहत पर्याप्त रोजगार और ऋण का सृजन, शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ावा और और राज्य शैक्षणिक बोर्ड को केंद्रीय बोर्ड के समकक्ष बनाया जाये, माध्यमिक परीक्षा में असफल छात्रों के लिए पर्याप्त काउंसलिंग और वैकल्पिक व्यवस्था होनी चाहिए, तकनीकी ज्ञान और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा, हर गांव को सड़क, बिजली से जोड़ने की जरुरत और साथ ही कानून व्यवस्था को दुरुस्त करने की जरुरत है|


Image: Tribhuvan Tiwari (source – Outlook)

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Ganesh Manjhi is a native of Simdega, Jharkhand. Currently he's a PhD scholar at Jawaharlal Nehru University, New Delhi. गणेश मांझी, सिमडेगा, झारखण्ड से हैं और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में PhD शोधार्थी हैं. साथ ही अभी गार्गी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक शिक्षक के रूप में कार्यरत हैं.

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