नगर

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Chandramohan Kisku

दक्षिन पूर्व रेलवे में कार्यरत चंद्रमोहन किस्कु की संताली भाषा में एक कविता पुस्तक "मुलुज लांदा"साहित्य अकादेमी दिल्ली से प्रकाशित हो चुकी है। वे संताली से हिंदी, हिंदी से संताली, बांग्ला से संताली में परस्पर अनुवाद करते हैं और अखिल भारतीय संताली लेखक संघ के आजीवन सदस्य हैं।

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नगर
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नगर में उगते नहीं है
चौड़ी रिश्तेवाली हरी खेत
नगर में उगते है
तंग रिश्तेवाली
गमले की फूल
नगर में होता नहीं
सोहराय ,साकरात और बाहा पर्व
नगर में होते है पर्व
बड़े -बड़े होर्डिंग में
दिवार पर चिपकी शॉपिंग मॉल की
डिस्काउंट देनेवाली विज्ञापन पर
नगर में लोग
पूछते नहीं हल -चाल
वे केवल अपनी जरुरत ही
प्रकट करते है
नगर में बारिस होती है
पर आता नहीं सावन
बच्चे भींगते नहीं है
खुसी से
नगर में आम की डाली से
गाती नहीं है कोयल
नगर में न सुनाई देता है
बाँसुरी की धुन
न औरतों की गीत की बोल
नगर में होते नहीं है
मांझी की अखड़ा में
नगाड़ा और मंदार की थाप पर
युवक -युवतियों की नाच
नगर में केवल रेडियो और
टेलीविजन पर ही गाते है लोग
नगर को चौड़ी सड़कें और
तंग गलियों में
टहलते समय
फँस सकते हो
वहाँ की तंग दिल की
काली कीचड़ में।

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Chandramohan Kisku

दक्षिन पूर्व रेलवे में कार्यरत चंद्रमोहन किस्कु की संताली भाषा में एक कविता पुस्तक "मुलुज लांदा" साहित्य अकादेमी दिल्ली से प्रकाशित हो चुकी है। वे संताली से हिंदी, हिंदी से संताली, बांग्ला से संताली में परस्पर अनुवाद करते हैं और अखिल भारतीय संताली लेखक संघ के आजीवन सदस्य हैं।

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