छत्तीसगढ़ के मीडिया संस्थानों की पत्रकारिता आदिवासी विहीन: ब्राम्हणवाद के कब्ज़े में!

इस साल के अगस्त में गैर-सरकारी संगठन ऑक्सफैम और न्यूज़लांड्री मीडिया संस्थान ने “हु टेल्स आवर स्टोरीज मैटर्स” नामक एक रिपोर्ट जारी किया. इसमें कई (हिंदी और अंग्रेजी) अख़बार, न्यूज़ चैनल, पत्रिका, ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल में दलित, आदिवासी, पिछड़ा वर्ग आदि की हिस्सेदारी का विस्तृत विवरण है. रिपोर्ट के मुताबिक, इन मीडिया संस्थानों में कुल 121 निर्णायक पदों में से 106 उच्च जाति के थे जबकि इनमें दलित और आदिवासी समुदाय का एक भी सदस्य नहीं था. हालांकि यह कोई नई खबर नहीं है. इसी तरह 2006 में मीडिया स्टडीज़ ग्रुप, दिल्ली के अनिल चमड़िया और सी.एस.डी.एस. के योगेंद्र यादव ने 37 मीडिया संस्थानों का अध्ययन किया और पाया कि फैसला लेने वाले 315 मुख्य पदों में केवल एक फीसदी अन्य पिछड़ा वर्ग से थे; जबकि इनमें कोई भी दलित व आदिवासी नहीं था. इस तरह 2006 की पहली रिपोर्ट के 13 वर्षों बाद भी मीडिया संस्थानों ने कोई भी कदम नहीं उठाये और उनमें सामाजिक विविधता न के बराबर ही रही, जबकि इनमें पूरी तरह सवर्णों का कब्ज़ा रहा.

जहाँ देश के मीडिया में आदिवासी पत्रकारों की स्थिति और उपस्थितिके बराबर है, छत्तीसगढ़ जैसा प्रदेश, जिसका करीब 60 प्रतिशत क्षेत्र आदिवासी बाहुल्य है, वहां भी बहुसंख्यक होने के बाद भी पत्रकारिता में आदिवासी पत्रकारों की संख्या दो प्रतिशत भी नहीं है. प्रदेश के बड़े मीडिया संस्थानों की पत्रकारिता आदिवासी विहीन है. अभी कुछ वर्षों से ही आदिवासी युवक/युवतियां पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में आगे रहे हैं, लेकिन वे भी सरकारी साज़िश और हमलों के शिकार हो रहे हैं.

ज्ञात जानकारी के अनुसार, आदिवासी बाहुल्य बस्तर संभाग में केवल 6 आदिवासी पत्रकार हैं, और वो भी लगातार दबाव और चुनौती के माहौल में कार्य करते हैं. बाकि क्षेत्रों की स्थिति भी लगभग इसी समान है. साल 2015 में आदिवासी पत्रकार सोमारू नाग को फ़र्जी नक्सल मामले में झूठे आरोप लगाकर गिरफ्तार कर लिया गया था; तो वहीं हाल ही में आदिवासी पत्रकार लिंगाराम कोडोपी, जिन्होंने कुछ वर्षों पहले जेल में पुलिस द्वारा गंभीर प्रताड़ना झेली थी, ने सुरक्षा बलों द्वारा जान से मारने की धमकी देने का आरोप भी लगाया है. कोड़ोपी लगातार नक्सल उन्मूलन के नाम पर फ़र्ज़ी मुठभेड़ों की रिपोर्टिंग करते आये हैं.

आदिवासी समुदाय के पत्रकार नहीं होने के कारण आदिवासियों की मूल संस्कृति, संस्कार, समस्याएं देश और विश्व के पटल पर नहीं आ पातीं.

बता दें कि पुलिस ने पत्रकार सोमारू नाग पर माओवादियों के साथ हिंसक गतिविधियों में भाग लेने का आरोप लगाया था और उन्हें दरभा इलाके से गिरफ़्तार किया था. उनके पक्ष में कोई भी सबूत अदालत में पेश कर पाने में पुलिस असफल रही थी जिसके बाद उन्हें जुलाई 2016 में बाइज्जत बरी कर दिया गया था. लेकिन इस दर्दनाक अनुभव ने सोमारू को इतना प्रभावित किया कि वो वापस पत्रकारिता में आज तक वापस कदम नहीं रख सका.

छत्तीसगढ़ जनसंपर्क विभाग के द्वारा अधिमान्यता प्राप्त पत्रकारों  की सूची में सालों से एक भी आदिवासी पत्रकार दर्ज नहीं है. इक्कादुक्का जो आदिवासी पत्रकार लिख रहे हैं उनको भी अधिमान्यता में स्थान नहीं दिया गया है. यही नहीं आंकड़ों की बात करें तो बस्तर संभाग के 7 जिलो के जनसंपर्क कार्यालय में एक भी आदिवासी पत्रकार की किसी मीडिया संस्थान में नियुक्ति दर्ज नहीं है.

आदिवासी क्षेत्रों में लगातार शिक्षा के स्तर में कोई सुधार नहीं आये हैं, साथ ही शिक्षा को सिर्फ सरकारी नौकरियों तक ही सीमित कर दिया गया है। इसी कारण कॉलेजों में पत्रकारिता जैसे विषयों पर शिक्षा का रुझान कम है। आदिवासियों में जो पहले से ही व्यावसायिक अध्ययन कर डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक बन चुके हैं, ऐसे पालक (अभिभावक) अपने बच्चों को भी व्यावसायिक अध्ययन की ओर भेजते हैं। आदिवासी क्षेत्रों में पत्रकारों पर बढ़ते हमले भी एक अहम् कारण है कि युवाओं में पत्रकारिता को लेकर डर पैदा किया जाता रहा है। आदिवासी पत्रकारों पर उत्पीड़न की घटनाएं भी स्थिति को और गंभीर बना देती है.

बस्तर से महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के छात्र  राकेश दर्रों  कहते हैं कि “पत्रकारिता पर कथित सवर्ण जातियों का कब्ज़ा आप देख ही सकते हैं। मुख्यधारा का मीडिया पूरी तरह से उनके ही कब्जे में है। आदिवासी तो दूर दलित बहुजनों के हाथ में भी कुछ नहीं है.” दर्रो, विश्वविद्यालय के निजी अनुभवों से बताते हैं कि, “पत्रकारिता विभाग में आदिवासी छात्रों का दाखिला होता भी है तो ज्यादातर या ड्रॉप आउट हो जाते हैं, या रोज़गार की कमी से कोई अन्य व्यवसाय की ओर चले जाते हैं.”

गैर-सरकारी संगठन ऑक्सफैम और न्यूज़लांड्री मीडिया संस्थान की रिपोर्ट के मुताबिक, मीडिया संस्थानों में कुल 121 निर्णायक पदों में से 106 उच्च जाति के थे जबकि इनमें दलित और आदिवासी समुदाय का एक भी सदस्य नहीं था. इसी तरह 2006 में मीडिया स्टडीज़ ग्रुप, दिल्ली के अनिल चमड़िया और सी.एस.डी.एस. के योगेंद्र यादव ने 37 मीडिया संस्थानों का अध्ययन किया और पाया कि फैसला लेने वाले 315 मुख्य पदों में केवल एक फीसदी अन्य पिछड़ा वर्ग से थे; जबकि इनमें कोई भी दलित व आदिवासी नहीं था.

ऐतिहासिक रूप से ये देखा जाये तो स्वतंत्रता से पहले से भी मीडिया पर पूंजीवादी वर्ग—जो कि इस देश में ज़्यादातर सवर्ण जातियों से हैं—का वर्चस्व शुरू से रहा है. बस्तर के आदिवासी पत्रकार मंगल कुंजाम, जिन्होंने 2018 ऑस्कर अवार्ड के लिए भारत की तरफ से सीधे ही आधिकारिक रूप से प्रवेश कर चुकी न्यूटन फिल्म के लिए किरदार और स्टोरी कॉन्सेप्ट पर कार्य किया है, कहते हैं किआदिवासी पत्रकारों को मीडिया में मंच नहीं दिया जाता है। आज की मीडिया उद्योपतियों की मीडिया है, अब एक आदिवासी औद्योगिक मीडिया तो खड़ा नहीं कर सकता? और जो एकदो लिख रहे है वो सरकार और पुलिस के दमन का शिकार हो रहे हैं। लिंगा कोडोपी आदिवासी पत्रकार हैं लगातार लिखते हैं लेकिन उन पर हुए सुरक्षाबल के हमले को लेकर प्रदेश के तमाम संघसंगठन चुप्पी साधे बैठे हैं?” कुंजाम मानते हैं कि मीडिया में ब्राह्मणवाद हावी है और आदिवासी पत्रकार लिखेंगे तो भी उन्हें जगह नहीं मिलेगी।

दंतेवाड़ा के वरिष्ठ पत्रकार बप्पी राय के अनुसार बस्तर संभाग में आदिवासी पत्रकार केवल  एकदो ही हैं.  वे कहते हैं किअगर आदिवासी पत्रकार होते तो उनकी बोलीभाषा अच्छे से समझ पाते, और समस्याओं को शासनप्रशासन तक पहुंचा पाते। ये दुर्भाग्य है कि अंचल में मीडिया के क्षेत्र में आदिवासी पत्रकार ढूंढते रह जाओगे। बस्तर की मौजूदा पत्रकारिता में जो पत्रकार कार्य कर रहे हैं वह भी चुनौतीपूर्ण पत्रकारिता कर रहे हैं।” 

आदिवासी समुदाय के पत्रकार नहीं होने के कारण आदिवासियों की मूल संस्कृति, संस्कार, समस्याएं देश और विश्व के पटल पर नहीं पातीं। कुछ वर्षों में बस्तर में यह भी देखने मे आया कि कुछ पत्रकार प्रशासन के द्वारा फाइनांस होकर हकीकत से परे खबर, रिपोर्टिंग किए जा रहे हैं—सरकार के मुखपत्र बन चुके हैं—जिसके कारण वास्तविक समस्याओं का निराकरण नहीं हो पाता है। वहीं दूसरी ओर बस्तर में बिना डिग्रीधारी पत्रकारों की संख्या सर्वाधिक है, उसमें भी कुछ आदिवासी सरपंच लोगों से उगाही की खबरें भी आती रहती हैं।

बस्तर के एक आदिवासी छात्र अनमोल मंडावी कहते हैं कि, “इन दिनों पत्रकारिता जनजातीय मुद्दों पर केंद्रित रहनी चाहिए लेकिन ऐसा नहीं है। छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की आबादी 32 प्रतिशत होने के बावजूद इस समाज के मुद्दे हाशिये पर चले गए हैं। आदिवासी सम्बन्धित पांचवी अनुसूची, छठवीं अनुसूची, पेसा एक्ट ऐसे कानून हैं जिन पर चर्चा होना आवश्यक है।”

साल 2015 में आदिवासी पत्रकार सोमारू नाग को फ़र्जी नक्सल मामले में झूठे आरोप लगाकर गिरफ्तार कर लिया गया था; तो वहीं हाल ही में आदिवासी पत्रकार लिंगाराम कोडोपी, जिन्होंने कुछ वर्षों पहले जेल में पुलिस द्वारा गंभीर प्रताड़ना झेली थी, ने सुरक्षा बलों द्वारा जान से मारने की धमकी देने का आरोप भी लगाया है. 

छत्तीसगढ़ में मुख्यधारा के चार बड़े अखबारों के एक भी संपादक दलित, आदिवासी, बहुजन नहीं है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि इस स्थिति में अगर एक जिले या ब्लाक का हाशिये के समुदाय का संवाददाता अपनी कहानी भेजता है तो उसे प्रकाशन में शायद ही स्थान दिया जाएगा; यही हाल टीवी मीडिया का भी है. जो स्थानीय पत्रकार हैं भी उन्हें कई सवर्ण पत्रकार केवल सोर्स की तरह इस्तेमाल करते हैं.

अभी हाल ही में दैनिक पत्रिका द्वारा बस्तर की नैतिक शिक्षा केंद्र गोटुल को सेक्स केंद्र बता कर प्रकाशित किया गया था हालांकि विरोध के बाद पत्रिका ने वह आर्टिकल अपने वेब से हटा लिया था. ये पहली दफा नहीं है. नाम लिखने की शर्त में एक बहुजन नौकरी पेशा लड़की कहती है,दरअसल अभी तक के नजरिए में मैने [सवर्ण] मीडिया को सिर्फ मूलनिवासियों के कार्टून बना के परोसते देखा हे कोई फोटो ले के बेचता है कोई आर्टिकल से बेचता है.”


Photo: Representational

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Tameshwar Sinha

तामेश्वर सिन्हा बस्तर में स्थित एक सक्रीय युवा पत्रकार हैं और पत्रकारिता के माध्यम से समाजसेवा का उद्देश्य लेकर चल रहे हैं। Tameshwar Sinha is a journalist based in Bastar and he aims to contribute to society with his journalism. तामेश्वर के ब्लॉग को यहाँ देखें : Follow Tameshwar's blog at: http://bastarprahri.blogspot.in

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