क्या है, गोंडवाना साम्राज्य के देवगढ़ किले का गौरवशाली इतिहास?

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Dr. Surya Bali

कोइतुर समुदाय के डॉ. सूर्या बाली फोर्ड फाउंडेशन इंटरनेशनल फेलो हैं। वे एक स्थापित गजलकार, लेखक और उर्दू के अदीब है। सामुदायिक चिकित्सा में एमडी हैं और अमेरिका से एमएचए की उपाधि हासिल की है। सम्प्रति एम्स भोपाल में प्रोफ़ेसर के पद पर कार्यरत हैं।

मध्य भारत में गोंडवाना साम्राज्य के वैभव और समृद्धि से जुड़े इतिहास आज भी अपनी गौरवशाली विरासत को बयान कर रहे हैं। इन्ही खूबसूरत विरसतों में से एक है देवगढ़ का किला। देवगढ़ का गोंड राज्य सोलहवीं शताब्दी के अंत में अस्तित्व में आया (मिश्र, 2008b) और अठारहवीं शताब्दी के मध्य तक फला फूला।

छिन्दवाड़ा ज़िले से लगभग 40 किलोमीटर दूर मोहखेड़ ब्लॉक के देवगढ़ गाँव में देवगढ़ का किला स्थित है। छिन्दवाड़ा नागपुर हाइवे पर उमरनाला से एक रास्ता मोहगढ़ लोहँगी ग्राम होकर देवगढ़ गाँव तक जाता है। गोंडवाना के विशेष क़िलों में से एक, यह क़िला सतपुडा शृंखला की 650 मीटर ऊंची पहाड़ी पर स्थित है और अपने गौरवशाली इतिहास के लिए जाना जाता है। किले के चारों तरफ गहरी खाई है और काफ़ी घने जंगल हैं । देवगढ़ गाँव क़िले की तलहटी में पूर्व की दिशा में स्थित है।

देवगढ़, नागपूर और छिंदवाड़ा के प्राचीन गोंड साम्राज्य का मुख्यालय था और एक समय में यह गढ़ और चांदागढ़ दोनों से ज्यादा प्रसिद्ध हो चुका था (रसेल, 1908)। क़रीब पौने दो सौ साल के अपने गौरवशाली इतिहास में पहले गढ़ा मंडला के अधीन रहा और फिर महारानी दुर्गावती की मृत्यु के बाद 1564 ईसवी में मुग़ल बादशाह अकबार के अधीन हो गया था। मुग़लों के पतन के बाद कुछ दशकों तक देवगढ़ राज्य की स्थिति अच्छी रही लेकिन दक्षिण से मराठों के उदय ने इस राज्य का सूरज मध्यम कर दिया।

देवगढ़ में गोंड सत्ता के संस्थापक जाटवा थे जो रणसूर और घनसूर को मारकर गोंडी सत्ता की ध्वजा देवगढ़ क़िले पर लहरायी थी। राजा जाटवा इतने प्रभावशाली और प्रसिद्ध हो गए थे कि उनसे मिलने स्वयं अकबर महान दिल्ली से चलकर सन 1590 ईसवी में देवगढ़ आया था और बहुत सारे उपहार और सम्मान से उन्हें नवाज़ा था(क्रेडोक, 1899) ।लगभग 60 साल के गौरव शाली प्रशासन के बाद राजा जाटवा का 1602 ईसवी में निधन हो गया।

राजा जाटवा ने देवगढ़ किले के अलावा पाटनसावंगी और नागरधन के किले भी बनवाए थे(रसेल, 1908)। राजा जाटवा के नाम का ताँबे का सिक्का जो नागपुर संग्रहालय में रखा गया है जिस पर साफ़ साफ़ अक्षरों में “श्री राजा जाटवा प्रतिराज” लिखा है, देवगढ़ की संपन्नता का गवाह है।आज भी जाटवा द्वारा बसाया गया विजयपुरा गाँव क़िले की तलहटी में उत्तर पूर्व में देखा जा सकता है। बख़्तबुलंद शाह द्वारा बसाया गया जयंतपुरा गाँव आज पठानपूरा के नाम से क़िले से दक्षिणी ओर स्थित है।

आईने अकबरी में अबुल फज़ल ने जाटबा को डेढ़ दो हज़ार घुड़सवारों, पचास हज़ार पैदल और सौ हाथियों का स्वामी बताया गया है(मिश्र, 2008a)।

देवगढ़ किले के तलहटी में धुरवा राजाओं की समाधियाँ हैं। यहीं पर प्रसिद्ध धुरवा राजा जातबा की समाधि भी है (गोंडवाना दर्शन, 2013)। आज भी धुर्वे गोत्र (7 देव ) वाले गोंड गढ़ गोंगो के लिए देवगढ़ जाते हैं और अपने देव  भीडी की पूजा अर्चना करते हैं। आज भी देवगढ़ में भव्य किले के खंधर, महलों के निशान और राजा जाटबा की समाधि दर्शनीय स्थलों में गिने जाते हैं।

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प्रसिद्ध इतिहासकार वेलनकर के अप्रकाशित शोधप्रबंध के अनुसार राजा जाटवा  के तीन पुत्र थे दलशाह, दुर्गशाह और कोकशाह जिसमें से ज्येष्ठ पुत्र दलशाह राजा जाटवा  की मृत्यु के बाद देवगढ़ की गद्दी पर बैठे और जिनका शासन 1634 ईसवी तक चला । दलशाह की मृत्यु के बाद उनका सबसे छोटा भाई कोकशाह 1634 ईसवी में देवगढ़ का अगला राजा बना(मिश्र, 2008b)।

कोकशाह उर्फ़ कोकिया देवगढ़ क़िले के  साथ साथ नागपुर क़िले का भी राजकाज संभालते थे। नागपुर की देख रेख के लिए उन्होंने सूबेदार देवाजी को नियुक्त किया था।कोकशाह की मृत्यु 1640 ईसवी में हुई और उसके बाद उनके बेटे केशरीशाह सत्तासीन हुए। सन 1648 ईसवी में मुग़ल बादशाह शाहनवाज़ खान द्वारा आक्रमण किया गया फिर औरंगज़ेब के समय 1658 ईसवी में मुग़ल सेनापति मिर्ज़ा खान ने आक्रमण किया। इस तरह 1660 ईसवी तक केशरीशाह मुग़लों से समझौता करके किसी तरह शासन पर बने रहे और मुग़लों को भारी लगान चुकाते रहे (रसेल, 1908)।

सन 1660  ईसवी में केशरीशाह की मृत्यु के बाद गोरखशाह उत्तराधिकारी बने और देवगढ़ की बागडोर सम्भाली ।गोरखशाह के समय पर लगान न चुका पाने के  कारण काफ़ी देनदारी बढ़ गयी थी इसलिए अगस्त 1669 ईसवी में दिलेर खान ने देवगढ़ पर हमला बोल दिया और पूरे क़िले को तोपों से बर्बाद कर दिया और गोरखशाह को बंदी बना कर उनके पाँच बेटों में से सबसे छोटे दोनों बेटों को मुस्लिम बना लिया।दिलेर खान ने दोनों बेटों के नाम इस्लामयार खान और दीदारखान रखा।इस तरह इस्लामखान के नाम पर देवगढ़ को इस्लामगढ़ कहा जाने लगा ।

इस्लामयार ने कुल 10 वर्षों तक देवगढ़ का शासन किया और उनकी मृत्यु के बाद उनके छोटे भाई दीदार खान ने 1680 ईसवी में देवगढ़ की गद्दी सम्भाली लेकिन सफल नहीं रहने के कारण औरंगज़ेब ने उन्हें  गद्दी से बेदख़ल करके उनके तीसरे बड़े भाई महीपत शाह को इस शर्त पर शासन लौटाया की वे इस्लाम क़ुबूल करें। 1686 ईसवी में महीपतशाह  इस्लाम धर्म स्वीकार करके बख़्तबुलंद शाह बन गए।

लेकिन बख़्तबुलंद शाह मुस्लिम धर्म स्वीकार करने  बाद भी गोंडों के प्रति  अपना प्रेम और मोह नहीं त्याग पाए और मुग़लों के ख़िलाफ़ बग़ावती रुख़ अख़्तियार किए रहे जिसका ख़ामियाज़ा उन्हें देवगढ़ का शासन छोड़कर चुकाना पड़ा। चाँदागढ़ के राजकुमार को मुस्लिम बनाकर (कानसिंह से नेकनाम खान) औरंगज़ेब ने देवगढ़ का शासन सौंप दिया लेकिन वह बहुत जल्दी ही वह असफल हो गया और औरंगज़ेब  मृत्यु के बाद बख़्तबुलंद शाह को अपना साम्राज्य विस्तार का पुनः  मौला मिल गया । बाद में बख़्तबुलंद शाह ने देवगढ़ के दक्षिण में नागपुर शहर बसाया(रसेल, 1908)।

बख़्तबुलंदशाह के बाद उनका बेटा चाँद सुल्तान 1709-1719 ईसवी के मध्य देवगढ़ की गद्दी पर बैठा और देवगढ़ में ख़ूब ख़ुशहाली और संपन्नता लाया । चाँद सुल्तान के 1737 ईसवी में मरने के पहले तक ये क़िला देवगढ़ राज्य की राजधानी बना रहा और बाद में वली शाह के सत्ता हथियाने के बाद राजधानी नागपुर स्थान्तरित हो गयी ।मुग़लों के बाद भोंसले और पेशवा ने भी कुछ समय तक इस क़िले राज किए और अंत  अंग्रेज़ों के हाथ में ये टूटा फूटा क़िला आया(मिश्र, 2008b)।

पेशवा और भोंसले राजघरानों ने गोंडवाना को कहीं का नहीं छोड़ा। हजारों की संख्या में गोंडो का कत्ले आम हुआ और गोंडवाना के किले और महलों को बारूद से उड़ाया गया जिससे दुबारा गोंड शासक फिर से सिर न उठा सकें। इसी दौरान सन 1742 में पाटन सावंगी के किले में  भोंसले मराठाओ द्वारा 12000 गोंडो का नरसंहार किया गया और इतिहास को कलंकित किया गया(रसेल, 1908)।

इतने झंझावतों के बाद भी देवगढ़ का किला आज भी गोंडवाना के वैभव और वीरता की कहानियां सुना रहा है। बेहद ख़ूबसूरत जंगलों के बीच,चारों ओर पहाड़ों से घिरा ये क़िला गोंडवाना के वैभवशाली और सम्पन्न क़िलों में गिना जाता है। क़िले के ऊपर जाने के लिए एक ही रास्ता है ।क़िले के मुख्य द्वार से ऊपर सीढ़ियों से चढ़ने पर दूसरा द्वार मिलता है जिसके अंदर जाने के बाद दाहिने हाथ पर हाथीखाना, बायें हाथ पर बावड़ी (मोतीटाँका) और सामने नक्कारखाना, कचेहरी, हम्माम, ख़ज़ाना, बादल महल, बुर्ज, मस्जिद, और बहुत सारी इमारतों के खंडहर अपनी भव्यता की गवाही दे रहे हैं।

ऐसा ख़ूबसूरत क़िला गोंडवाना के इतिहास में अभी तक नहीं देखा सुना गया है।दुर्भाग्य देखिए की इतनी विशेषताओं के बाद भी आज तक क़िले के ऊपर तक जाने के लिए रास्ता तक नहीं बन पाया है। गोंडवाना के धरोहरों की जितनी उपेक्षा इस देश में हो रही है शायद ही दुनिया में कहीं ऐसा होता हो। यहाँ की सरकारें और प्रशासन जानबूझ कर इन धरोहरों तक पहुँच मार्ग और सड़कें नहीं बनवाते और न ही पर्यटन के मानचित्र पर इन्हे जगह देते हैं। अगर इसी तरह इन धरोहरों की उपेक्षा होती रही तो जल्दी ही आने वाली कोईतूर पीढ़ियाँ अपने वैभवशाली इतिहास को देखने को तरस जाएंगी।


संदर्भ सूची :

  1. क्रेडोकआर. (1899). रिपोर्ट आन लैंड रेविन्यू सेटेलमेंट आफ नागपुर डिस्ट्रिक्ट,
  2. गोंडवाना दर्शन. (2013). देवगढ़ का धुरवा राजघराना [ब्लॉग]. Retrieved July 26, 2019, from GONDWANA SANDESH (गोंडवाना सन्देश) website: http://gondwanasandeshraipur.blogspot.com/2013/03/blog-post.html
  3. मिश्र सुरेश. (2008a). गढ़ा का गोंड राज्य (प्रथम संस्करण, Vol. 1). राजकमल प्रकाशन प्रा लि, नई दिल्ली.
  4. मिश्र सुरेश. (2008b). देवगढ़ का गोंड राज्य (पहला संस्करण). भोपाल: राजकमल प्रकाशन प्रा लि, नई दिल्ली.
  5. रसेल आर व्ही. (1908). सेंट्रल प्रोविन्स -डिस्ट्रिक्ट गजेटियर्स: नागपुर डिस्ट्रिक्; वॉल्यूम ए -डिस्क्रीप्टिव. Retrieved from https://iaus.archive.org/31/items/in.ernet.dli.2015.31332/2015.31332.Central-Provinces-District-Gazetteers-Nagpur-District-Vol-A.pdf

 

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