‘क्या भारत देश का यही लोकतंत्र है?’: लिंगाराम कोड़ोपी का साथी युवाओं को पत्र

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लिंगा राम कोड़ोपी बस्तर में स्थित एक पत्रकार हैं, जो आदिवासियों पर हो रहे अत्याचारों की घटनाओं पर सक्रीय रूप से रिपोर्टिंग करते रहे हैं. उनकी नई डाक्यूमेंट्री ” हिड़मे कवासी कौन है?” की स्क्रीनिंग का कार्यक्रम डॉन बोस्को कॉलेज गोवा में रखा गया. इसका संयोजन डीबी फिल्म क्लब ने किया. लिंगाराम कोड़ोपी ने सभा को पढने के लिए एक पत्र लिखा था, जिसका प्रकाशन यहाँ किया जा रहा है:

 

प्रिय साथियों,

मेरे लिए इससे बड़ी खुशी कुछ नहीं हो सकती कि आप इस फिल्म को देख कर बस्तर के बारे में जान पाएं। आप सभी विद्यार्थी किसी न किसी धर्म से, जाति से जुड़े होंगे। आप व हम इसी देश के नागरिक हैं। मैं आप सब को धन्यवाद देना चाहूँगा कि आप सब ने मिलकर मुझे मौका दिया है कि मैं आदिवासियों के प्रतिनिधि के रूप में फिल्म के जरिये आप तक बस्तर के हालात पहुंचा सकूं।

यह फिल्म एक आदिवासी लड़की के ऊपर हैं। हिड़मे कवासी 15 बरस की थी जब उसे नक्सल के नाम पर ऊठाया गया। एक महीना तक कई थानो में ले जाकर उसका बलात्कार किया गया। उसपर देशद्रोह की धारा (UAPA) लगाकर जेल भेज दिया गया। आठ साल तक कैद में रहने के बाद हिड़मे को कोर्ट ने निर्दोष करार दिया। मैं हिड़मे से जगदलपुर जेल में मिला और उसकी आपबीती सुनकर हैरान रह गया कि मेरे भारत देश में, जो विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश होने का दावा करता है, एक आदिवासी बालिका के साथ ऐसा अत्याचार हुआ है। तभी मेरे मस्तिष्क ने मुझसे कहा कि जब भी मैं जेल से निकलूं, हिड़मे कवासी पर फिल्म बनाऊ और लोगों से एक सवाल पूछूं कि क्या भारत देश का यही लोकतंत्र है?

आप देश के भविष्य हैं, आप से ही देश बदलेगा, और आप ही बदल सकते हो। मैं भी छत्तीसगढ़ के बस्तर का एक युवक हूं, मैं भी आप सब की तरह पढ़ना चाहता था। मैं बस्तर के हालातो के कारण पढ़ नही पाया और नक्सल के नाम पर जेल भेज दिया गया। हर राज्य के युवा वर्ग  मिल कर किसी नतीजे पर पहुंचे, बड़ी उपलब्धि क्या हो सकती है? आने वाला भविष्य हमारा है। हमे आने वाले इससे भविष्य के बारे में सोचना हैं। आज पुरे भारत देश में, किसी न किसी तरह हर राज्य में गृह-युद्ध की स्तिथि बनी हुई है। पुरे देश में राष्ट्रवाद के नाम पर कुछ न कुछ हो रहा है। ये घटनाएँ दिनो-दिन बढ़ती जा रही हैं । खुलेआम लोकतंत्र की हत्या हो रही है। राष्ट्रवाद पर युवा वर्ग कुछ बोलता हैं तो देशद्रोह का नाम दिया जाता है। भारत का संविधान व लोकतंत्र कहता हैं कि सभी को समान अधिकार दिया गया है। भारत देश के किसी भी राज्य में देश का नागरिक अपना जीवन यापन कर सकता है। विचार रखने की भी आजादी दी गयी है। पर वे कानून कहां हैं, किस जगह पर हैं, जिनका पालन कर देश में शांति स्थापित की जा सकती है?

छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर के जो वर्तमान हालात हैं, वे देश के लोकतंत्र के लिए बहुत ही खतरनाक हैं। यहां पत्रकारों, समाजसेवियों और वकीलों पर हमले हो रहे हैं। साथ-साथ आदिवासी महिलाओं के साथ नक्सलवाद के नाम पर सामुहिक बलात्कार हो रहा है। कानून का पालन नही किया जा रहा है। बस्तर में लोकतंत्र की बात करना एक गुनाह सा बन गया है। यहां के आदिवासी अपनी बात लोकतांत्रिक तरीके से प्रशासन के समक्ष रखना चाहते हैं पर यहां की कानून व्यवस्था ऐसा नहीं चाहती । ऐसे में गृह-युद्ध के हालात और भी बढ़ते जा रहे हैं। दिनांक 30/3/2016 को माओवादियों ने सात जवानों को बम ब्लास्ट कर मार दिया। वाहन के तो छितड़े उड़ा दिये। लाशों से पता भी नही चल रहा था कि मरने वाला कौन है। मैं बस्तर का निवासी हूं और मेरा कर्तव्य बनता हैं कि मैं उस जगह जाऊं और देखूं कि क्या हो रहा है। मै विडियोग्राफी कर रहा था कि तभी एक पुलिस वाला आकर बोला कि आप किसके लिए कर रहे हो? मेरे पास जवाब नही था। तभी सोनी सोरी सामने आयी और बोली कि मेरे लिए कर रहा है। हमें तो ये भी अधिकार नहीं है कि कोई मरे तो हम विडियो या फोटोग्राफी भी कर सके। बस्तर में आकर मरने वाला कोई भी हो, दुख तो यहा के आदिवासियों को भी होता है। मरने वाले कोई और नहीं थें, अपने ही देश के भाई थें। वे किसी माँ का लाल था, बहन का भाई, किसी का पिता। केन्द्र व राज्य शासन में बैठे लोगों का वही रटा-रटाया बयान आयेगा कि इस घटना कि घोर निंदा करते हैं या शहीदों की कुर्बानी व्यर्थ नही जायेगी। सरकार से कौन पुछेगा कि इतने समर्पण हुए हैं तो हमारे भाईयों को कौन मार रहा है? मारने वाले भी शायद कोई और नहीं हैं, वे भी हमारे ही भाई हैं।

इस घटना के बाद फिर आदिवासियों पर पुलिस प्रशासन का कहर बरसेगा। कई आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार होगा, कई आदिवासियों पर इस घटना को लेकर फर्जी केस बनाये जाएंगें और मौतें भी हो सकती हैं। केन्द्र व राज्य सरकार कहती हैं कि नक्सलवाद देश के आंतरिक सुरंक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है? फिर नक्सलवाद से बातचीत क्यों नहीं करती सरकार? देखने को तो यह भी मिला है कि जब-जब नक्सलवाद ने भारत सरकार से बात करने कि कोशिश कि तब-तब नक्सली नेताओं को मार गिराया। उदाहरण के तौर पर 2010 में नक्सली प्रवक्ता आजाद सिजफायर व बातचीत के लिए गृह मंत्रालय से बात चल रही थी, तभी उन्हें पकड़ कर मार दिया गया । इस प्रकार के कृत्य भारत सरकार द्वारा किये जाते हैं तो नक्सलवाद कैसे समाप्त होगा? नक्सलवाद को बढ़ावा भी सरकार ही दे रही है, उदाहरण के तौर पर दंन्तेवाड़ा के S.P. अंकित गर्ग जिन्हे गेलेन्ट्री अवार्ड दिया गया। वह एक अपराधी थे, सोनी सोड़ी की प्रताड़ना के मुख्य आरोपी थे, फिर उन्हें राष्ट्रपति द्वारा गेलेट्री अवार्ड क्यों दिया गया? शिव राम प्रसाद कल्लूरी जो कि वर्तमान मे बस्तर संभाग के I. G. हैं, इन्होने 2010 में 310 आदिवासी घरो को जलवा दिया कुछ महिलाओं के साथ बलात्कार और हत्याएं हुई, उस वक्त शिव राम प्रसाद कल्लूरी दंन्तेवाड़ा के S.P. थे, आज तक जांच चल रही है, फिर उन्हें बस्तर का I.G. बनाकर दुबारा भेजा गया।

जिसने भी सरकार का विरोध किया हैं चाहे वह विद्यार्थी हो, समाज सेवी हो, वकील हो, पत्रकार हो, या देश का आम नागरिक। सरकार ने उसे हमेशा देशद्रोह का नाम दिया है। देश मे जो घटनाएं दिनो-दिन बढ़ती जा रही हैं, उन्हे रोकने के लिए युवा वर्ग को कदम उठाना होगा। नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब भारत देश में लोकतंत्र का नाम लेना भी मुश्किल हो जाएगा। मैं आप सभी विद्यार्थियों से आशा करता हूं कि आप सब देश के हालातों पर गौर करेंगे और दिशा तय करेंगे कि देश में क्या होना है, और क्या नहीं। मैंने लिख कर कसी भी प्रकार से आप लोगों के भावनाओं को ठेस पहुंचाई हो तो मैं आप सब से क्षमा की प्रार्थना करता हूं।

आप सब का बहुत-बहुत धन्यवाद।

प्रार्थी,

लिंगा राम कोड़ोपी,

(छ. ग.) बस्तर संभाग,

जिला – दंन्तेवाड़ा।

01/04/2016



We thank Atul Anand for sharing the letter and poster with us.

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Editor

Editorial Team of Adivasi Resurgence.

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