कोयतूरियन जीवन दर्शन की सीख देता ‘छेर छेरता’ पुनेमी पाबुन

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Dr. Surya Bali

कोइतुर समुदाय के डॉ. सूर्या बाली फोर्ड फाउंडेशन इंटरनेशनल फेलो हैं। वे एक स्थापित गजलकार, लेखक और उर्दू के अदीब है। सामुदायिक चिकित्सा में एमडी हैं और अमेरिका से एमएचए की उपाधि हासिल की है। सम्प्रति एम्स भोपाल में प्रोफ़ेसर के पद पर कार्यरत हैं।

छेर छेरता पूनेमी पाबुन जनजातीय लोगों का बहुत ही प्राचीन उत्सव है । यह उत्सव आर्य आगमन के पूर्व से ही सम्पूर्ण भारत में  प्रचलित था जो कालांतर में कुछ जनजाति बाहुल्य राज्यों तक सीमित होकर रह गया ।आज भी यह त्योहार छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश , तेलंगाना , इत्यादि राज्यों में धूम धाम से मनाया जाता है । मूलत: यह त्योहार बच्चों का है  जिसमें बच्चों द्वारा ही पूरे कार्यक्रम की रूपरेखा तय की जाती हैं और वही पूरे उत्सव की कमान सम्भालते हैं ।

आर्यों के आगमन से पूर्व गोंडवाना लैंड की इस धरती पर गोटुल  ही शिक्षा के एकमात्र केंद्र हुआ करते थे  जो कालांतर में आर्य ऋषियों के आश्रम बने और उसके बाद गुरुकुल का रूप ले लिए और आज के जमाने में विद्यालय, महाविद्यालय और विश्व विद्यालय का रूप ले चुके हैं । इन्हीं गोटुलों में मूलनिवासी बालक और बालिकाओं की संपूर्ण शिक्षा दीक्षा की व्यवस्था होती थी और शिक्षा पूरी करके सभी छात्र छात्राएं गृहस्थ जीवन में प्रवेश करते थे। छेर छेरता त्योहार पूरे एक माह तक मनाया जाता है जिसकी तैयारी पूस पूर्णिमा से शुरू होकर माघ पूर्णिमा तक पूरे एक माह  चलती  है । यह त्योहार धान की फसल  के  मिसाई के उपरांत कोठी (बखार) में सुरक्षित रखने के बाद शुरू होता है। यह उत्सव में एक तरह से गोटुल के सभी छात्रों की अंतिम परीक्षा होती है और मुठवा (आचार्य) लोग ये तय करते हैं कि गोटुल से निकलने वाले छात्र और छात्राएँ सामाजिक जीवन जीने के योग्य हुए कि नहीं । इस उत्सव की प्रक्रिया में गोटुल के सभी  लड़के लड़कियां गृहस्थी के  सभी जरूरी सामान खुद अपने हाथों से तैयार करते हैं और टोलियां बनाकर छेर छेरता गीत गाते हुए घर घर से  घान चावल  अन्य अन्न और पैसा इकट्टा करते हैं ।छेर छेरता पर्व के दौरान सभी बच्चे सुआ नृत्य, शैला नृत्य, कर्मा नृत्य  का प्रदर्शन करते हैं ।आज जब गोटुल खत्म हो चुके हैं और जनजातियां अपनी पारम्परिक संस्कृति और सभ्यता से दूर हो चुकी है तब भी ये परंपरा जनजातीय समुदायों में बरकरार है और छेर छेरता त्योहार के रूप में कोयापुनेमी संस्कृति को संरक्षित और संवर्धित किए हुए है ।

सगा सग्गुम आदिम सामाजिक संस्था भोपाल के तत्वाधान में मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और छ्तीसगढ़ के जनजातीय समुदाय और विशेषकर बच्चों द्वारा ये कार्यक्रम बड़े धूम धाम से मनाया गया ।जिसमें बच्चों ने ही पूरे कार्यक्रम को संपन्न किया । बच्चों ने ही  मंच का संचालन किया और बच्चे ही अतिथियों की भूमिका में थे। बच्चों द्वारा बहुत से नृत्य, गीत और सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए। छेर छेरता उत्सव मनाने के लिए बच्चों ने घर घर जाकर चंदा इकट्ठा किया जिसमे उन्हें  जो भी चावल दाल और पैसे मिले उससे सभी  बच्चे मिलकर खाना बनाए  और सभी समुदाय के छोटे बड़े सदस्यों के साथ मिलजुल कर छेर छेरता उत्सव को नाच  गा कर मनाया! ऐसे सभी बच्चे बधाई के पात्र हैं जो अपने सभ्यता और संस्कृति को बचाए रखने के लिए आगे आ रहे हैं । समस्त कोयाविडार को बहुत बहुत सेवामान और छेर छेरता पुनेमी पाबुन की गाड़ा गाड़ा बधाइयाँ और शुभकामनाँये।

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Dr. Surya Bali

कोइतुर समुदाय के डॉ. सूर्या बाली फोर्ड फाउंडेशन इंटरनेशनल फेलो हैं। वे एक स्थापित गजलकार, लेखक और उर्दू के अदीब है। सामुदायिक चिकित्सा में एमडी हैं और अमेरिका से एमएचए की उपाधि हासिल की है। सम्प्रति एम्स भोपाल में प्रोफ़ेसर के पद पर कार्यरत हैं।

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