आर्थिक आत्मनिर्भरता: आदिवासी समाज में बचत का महत्व

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Ganesh Manjhi

Ganesh Manjhi is a native of Simdega, Jharkhand. Currently he's a PhD scholar at Jawaharlal Nehru University. He is currently working as Assistant Professor (Economics) in Gargi College, Delhi University.

गणेश मांझी, सिमडेगा, झारखण्ड से हैं और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में PhD शोधार्थी हैं. साथ ही अभी गार्गी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर(अर्थशास्त्र) के रूप में कार्यरत हैं.

Email: gmanjhidse@gmail.com

पुरानी कहावत है, जीवन भर खुश रहना है तो अत्यधिक बचत करो| वस्तुतः, बृहत् तौर पर अत्यधिक बचत से लम्बी अवधि में आर्थिक विकास की सम्भावना अधिक होती है, लेकिन इसकी वजह से अल्पावधि में आय की कमी होगी क्यूंकि वर्तमान में खर्चे कम होंगे और बचत ज्यादा| खर्चे कम होने से वर्तमान में आर्थिक विकास कम होंगी और आय में कमी होगी| अंततः, आय कम होने से बचत और खर्च दोनों में कमी आएगी जिससे वर्तमान और भविष्य दोनों में आर्थिक विकास में मंदी हो सकती है| फलतः, बचत ज्यादा कर के अधिक आय करने की कोशिश में अंततः कम आर्थिक वृद्धि में सीमित हो जाना पड़ेगा| इस सिद्धांत को बचत का विरोधाभास सिद्धांत कहते हैं| शायद इसी को ध्यान में रखते हुए कीन्स (Keynes) ने बचत कम और खर्च अधिक की बात कही है जिसपर आधुनिक अर्थव्यवस्था निर्भर करता रहा है| इसी संकल्पना को आदिवासी के दृष्टिकोण से देखा जाये तो आदिवासी समाज काफी हद तक कीनेसियन (Keynesian) नजर आता है| ये लेख आदिवासी अर्थव्यवस्था में बचत की संकल्पना का विश्लेषण करता है|

सामान्यतः, सम्पति को वित्तीय-सम्पत्ति और गैर-वित्तीय सम्पति दो तरीके से समझा जा सकता है और दोनों को बचत भी किया जा सकता है| वित्तीय-संपत्ति मौद्रिक होती हैं और गैर-वित्तीय के अंतर्गत घर, जमीन, कार इत्यादि आते हैं| आदिवासी अर्थव्यवस्था में बचत के दृष्टिकोण से देखा जाये तो आदिवासी वर्तमान की ज्यादा सोचता है तथा धन ज्यादा इक्कठा नहीं करता है| धन ज्यादा इक्कठा का मतलब है अधिक बर्बादी और संसाधनों का अत्यधिक दोहन, जो की सत्तत विकास में बाधक है| धन इक्कठा करना, नहीं करना, आधुनिक आर्थिक व्यवस्था के दो अलग पहलु हैं| अति-पूँजीवाद जो आधुनिक अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग बन चुका है संसाधनों का अत्यधिक दोहन और अधिक धन भी इक्कठा करना चाहता है| दूसरा पहलू बचत कम लेकिन मांग आधारित आर्थिक व्यवस्था को दर्शाता है जो की संसाधनों के सतत उत्पादक क्षमता पर विश्वास करता है और अत्यधिक दोहन और अत्यधिक धन इक्कठा करने से बचने की कोशिश करता है| इन दोनों पहलुवों को लोगों द्वारा देखने का अपना-अलग नजरिया हो सकता है| जैसे, भविष्य में कौन जिन्दा रहेगा? डार्विन कहता है जो मजबूत है वो जिन्दा रहेगा, अब सोचने वाली बात है मजबूत कौन है? वो, जो अधिक गर्मी झेलने के लिए अपने एसी की क्षमता बढ़ाते जा रहे हैं और संसाधन का अधिक दोहन कर रहे हैं, या वो जो 45/50 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी खेत में काम कर सकता है? आपके अपने निर्णय हो सकते हैं आपका अपना तर्क हो सकता है| आपकी ब्याख्या अल्पावधि या लम्बी अवधि के हिसाब से बदल भी सकता है|

आदिवासी समुदायों के बीच धन की सामुदायिक बचत की एक संकल्पना है जिसे ‘धान का गोला’ कहा जाता है| धान का गोला जिसका जिक्र बहुत से विद्वानों ने भी किया है परन्तु पढ़ कर समझने से पहले निजी अनुभव से आदिवासियों के एक छोटे से आर्थिकी को समझने की कोशिश करते हैं| आधुनिक अर्थव्यवस्था में जिस प्रकार वित्तीय बैंक का महत्त्व है ऐसा ही महत्त्व आदिवासियों के जीवन में ‘धान का गोला’ का है| इसे साधारण भाषा में धान का बैंक कहा जा सकता है| अक्सर इसकी शुरुवात गांव स्तर पर अगहन के दिनों में होती है, यानि की जब धान पर्याप्त मात्रा में सबके घर में होता है| अगर किसी गांव में 10 घर हैं तो हरेक घर शुरवात में कुछ धान, गोला में जमा करेगा, जैसे – अगर हरेक घर 5-5 पैला (सेर) जमा करते हैं तो 50 पैला हो जायेगा| जब धान जमा हो जाये तो इसे गाँव की अर्थव्यवस्था को ठीक करने और किसी भी परिवार को सामान्य सूद में ऋण दिया जाता है| जैसे, अगर धान बुवाई के समय किसी के पास बीज के लिए धान की कमी हो जाये तो नगण्य दर पर उसे धान ऋण दिया जाता है फिर जब अगले वर्ष अगहन के महीने में पर्याप्त उपज हो जाये तो ऋणी व्यक्ति/परिवार सूद समेत धान वापस करेगा और ‘धान का गोला’ में भी इजाफ़ा होगा| जब ये प्रक्रिया सतत काफी सालों तक चले और ‘गोला’ में पर्याप्त वृद्धि हो जाये तो धान की कुछ न्यूनतम मात्रा को गोला के लिए छोड़कर बाकी को सभी साझेदार परिवार आपस में बाँट लेते हैं| इस तरीके से सुरक्षित भविष्य के लिए सार्वजानिक बचत प्रणाली का और आदिवासी आर्थिक व्यवस्था के ‘धान बैंकिंग’ प्रणाली का विकास हुआ|

धीरे-धीरे इस व्यवस्था का क्षय हो रहा है क्यूँकि इस पर भी अति-पूंजीवादी व्यवस्था की जबरदस्त मार पड़ी है| तात्पर्य यह है की लोग धान लेने के बाद वापस नहीं करते हैं| इस प्रकार एक व्यक्ति के धान वापस नहीं करने, दूसरे व्यक्ति के द्वारा धान वापस नहीं करने और इस प्रकार ऐसे लोगों की संख्या बढ़ते जाये तो उसे ‘धान का गोला’ में संकट की स्थिति कही जाएगी| और ऐसी परिस्थिति में बचे हुए लोग शेष धान को आपस में बांटकर ‘धान का गोला’ को बंद कर देते हैं| इस प्रकार आदिवासी समाज में एकजुटता तथा समाजवादी व्यवस्था का प्रतीक काफी सारे गांवों में अंतिम सांसे भी लेने लगा है| आधुनिक बैंकिंग प्रणाली, धान कम और पैसे की ज्यादा जरुरत ने लोगों को अत्यधिक व्यक्तिपरक और स्वार्थी बना दिया है और अभी की स्थिति में ‘धान का गोला’ एक इतिहास मात्र बनने की ओर अग्रसर है|

वित्तीय और गैर-वित्तीय सम्पत्ति की बचत, पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों की बचत से सीधे तौर पर कैसे सम्बंधित है आईए समझने की कोशिश करते हैं| गौर करने वाली बात है कि एक तरफ वित्तीय या गैर-वित्तीय बचत पर आदिवासी समुदाय का ध्यान भले न गया हो लेकिन जैसे ही पर्यावरण/प्राकृतिक संसाधनों के बचत की बात आती है आदिवासी समुदाय पहली पंक्ति में खड़ा नजर आता है| शायद इसलिए क्यूँकि इनका जीवन-दर्शन सीधे तौर पर प्रकृति से जुड़ा हुआ है| वित्तीय और गैर-वित्तीय सम्पत्ति से क्रमशः वित्तीय/धन पूँजी और भौतिक पूँजी का निर्माण होता है उसी प्रकार प्रकृति से प्राकृतिक पूँजी का निर्माण होता है| प्राकृतिक पूँजी का सही इस्तेमाल सतत विकास के लिए बहुत जरुरी है और यही वजह है आदिवासी समुदाय हमेशा प्रकृति के बचाव मुद्रा में होता है|

दूसरा दृष्टिकोण ये कहता है कि लगभग 500 ई.पू. पृथ्वी/प्रकृति 10 करोड़ जनसँख्या को बर्दाश्त कर चुका है, और अभी 700 करोड़ से ज्यादा जनसँख्या को भी पालने में सक्षम है| इसका मतलब हम कहीं-न-कहीं पृथ्वी की पूर्ण क्षमता को मापने में असफल रहे हैं और इसके बावजूद प्रकृति अपने आप को समायोजित करने में सफल रहा है इसलिए हमें प्रकृति का दोहन करते ही जाना है| खैर, प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों  और पर्यावरण को आदिवासी बचाते आ रहा है ये सच्चाई है और अभी भी आदिवासी बहुल इलाके में जंगल, पहाड़, नदी, जानवर सभी मिलेंगे| दिल्ली से सटे यमुना में शायद ही आपको जिन्दा मछली देखने को मिले, और दिल्ली से सटे कूड़े के ढेर के गिरने से कुछ लोग दब कर मर जाते हैं ये भी संसाधनों के अत्यधिक दोहन का प्रमाण है| आदिवासी, आखिर प्रकृति को किसके लिए बचाना चाह रहा है? कौन संसाधनों का अत्यधिक दोहन कर रहा है? क्या सेल (SAIL) भिलाई में हुई मौतों को लेकर मुख्यमंत्री ट्वीट करते हैं या ट्वीट सिर्फ उनके लिए होता है जो प्राकृतिक संसाधनों को विलासिता की वस्तु के दृष्टिकोण से देखते हैं?

संसाधनों को बचाना, पर्यावरण को सहेजना अच्छी बात है लेकिन किसके लिए और क्यों पर विचार होना जरुरी है| बीच-बीच में आदिवासी आर्थिकी के बचत में चालाकी जरुरी है, जैसे आदिवासी अपने बचाये संसाधनों का खुद ही सतत दोहन करे और वो सतत चलता रहे क्यूंकि आप संशाधनों और पर्यावरण के पुनर्व्यवस्थापन और सतत आर्थिक पर विश्वास करते हैं|


यह लेख पहले प्रभात खबर, मार्च  8 , 2019 में प्रकाशित हो चुका है. 


फोटो : gvanstijn

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Ganesh Manjhi is a native of Simdega, Jharkhand. Currently he's a PhD scholar at Jawaharlal Nehru University. He is currently working as Assistant Professor (Economics) in Gargi College, Delhi University. गणेश मांझी, सिमडेगा, झारखण्ड से हैं और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में PhD शोधार्थी हैं. साथ ही अभी गार्गी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर(अर्थशास्त्र) के रूप में कार्यरत हैं. Email: gmanjhidse@gmail.com

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