आदिवासी जीवन-दर्शन और वन अधिकार कानून: क्या है सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का भविष्य?

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Ganesh Manjhi

Ganesh Manjhi is a native of Simdega, Jharkhand. Currently he's a PhD scholar at Jawaharlal Nehru University. He is currently working as Assistant Professor (Economics) in Gargi College, Delhi University.

गणेश मांझी, सिमडेगा, झारखण्ड से हैं और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में PhD शोधार्थी हैं. साथ ही अभी गार्गी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर(अर्थशास्त्र) के रूप में कार्यरत हैं.

Email: gmanjhidse@gmail.com

फोटो : गणेश मांझी


बस्तर और कुछ अन्य जगहों के आदिवासी, सीजन में पहली बार पकने वाले फल को नहीं खाते हैं| तर्क ये है कि ये पेड़ से गिरते हैं और जमीन में फिर से नए पौधे उगाते हैं| ये पृथ्वी और वातावरण को सतत प्रगतिशील और नष्ट होने से बचाये रखते है| दूसरी, तीसरी, या उससे आगे पकने वाले फलों को खाया जाता है| अक्सर, आम खाने के बाद गुठली को फेंकना एक बात है, लेकिन पहली सीजन के पके फल इसलिए नहीं खाना की प्रकृति भविष्य में सतत जीवन बनाये रखे और पृथ्वी पर अनवरत जीवन बना रहे, आदिवासी सोच की ये एक मिसाल है जो विरले देखने को मिलती है| क्या ऐसी सोच रखने वाले समुदाय भला प्रकृति को सहेज कर रखने में सक्षम नहीं है, या तथाकथित मुख्यधारा के विद्वान की दिमागी उत्पन्न है की जंगल जानवरों के लिए है आदिवासियों के लिए नहीं| अभ्युदय का वो सतत समय याद है जब मनुष्य खेती करना सीखा, एक साथ रहना शुरू किया और प्राकृतिक चीजों को सहेजना शुरू किया, लोहे गलाने की पद्धति कमोबेश जंगलों में रहने वाले असुरों ने विकसित किया| आज तथाकथित सभ्य समाज को जंगल के इलाके वाले आदिवासी नहीं चाहिए, शायद शहरी लोगों की नजर में वो विकास विरोधी है! वैसे भी अ(सभ्य) समाज कभी भी आदिवासियों को जानवरों से बेहतर नहीं समझा, और जब आदिवासी जंगल और जानवरों के साथ रहना चाहते हैं तो रहने दो न उन्हें जानवरों के साथ, इनकी सभ्यता अपने गति से उदय होगी| मोगली का जानवर के साथ रहने वाली जीवन पर फिल्म करोड़ो का कारोबार कर जाती है और शहरी समाज उसका आनंद लेती है, लेकिन लगता है हकीकत बिल्कुल इसके उलट है|

इन तमाम – विकास, राजनीति और जिन्दा रहने की कवायद की बहसों के बीच कुछ अजीबो-गरीब निर्णय राज्य द्वारा लिया जाने लगा है जो की आदिवासी समुदाय के अस्तित्व पर ही सवाल खड़े करता है| पहले, अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार कानून पर छेड़छाड़, फिर रोस्टर, फिर जंगल के इलाकों में रहने वाले आदिवासियों को घर खाली करने का आदेश ये सारे निर्णय आदिवासियों के अस्तित्व पर ही तो आक्रमण है| उच्चतम न्यायालय के 5 जनवरी 2011 के मार्कण्डेय काटजू के खंडपीठ के निर्णय में अनुसूचित जनजाति/ आदिवासी को भारत के प्रथम मूलवासी का वंशज कहा गया है| इस निर्णय के बाद यहाँ आदिवासियों में थोड़ी सी आस जगी थी लेकिन अब ऐसे लगता जैसे आदिवासी ही इस देश के लिए सबसे बड़ा रोड़ा है| जिनकी संख्या लगभग 8% है लेकिन भारतीय प्रजातंत्र में हाशिये और अवहेलना ही मिला है| वास्तव में, आदिवासियों की राजनीतिक उपयोगिता के आधार पर इन्हें तृतीय श्रेणी का ही नागरिक समझा गया है| खैर, बलत्कृत नंदा बाई अपना केस जीत गयीं, लेकिन क्या उनके दर्द भर गए, क्या बलात्कार और अनुसूचित जाति/ जनजाति अत्याचार अधिनियम के तहत भी कुछ ही सालों की कैद की सजा होती है?

दरअसल ऐतिहासिक रूप से आदिवासी अपने आप को और प्रकृति को बचाने की जुग्गत में लगा रहा और तथाकथित मुख्यधारा आदिवासियों को दूसरे-तीसरे दर्जे का नागरिक समझता रहा और इसके लिए गैर आदिवासियों और राज्य द्वारा तमाम किस्म के राजनीतिक, कानूनी, सांस्कृतिक, धार्मिक हथकंडे अपनाये गए तथा संविधान में समुचित प्रावधानों के बावजूद प्रजातंत्र के तीन स्तम्भों — कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका से दूर ही रखा|

‘ऐतिहासिक अन्याय’ और समकालीन शोषण
हाल ही में उच्चतम न्यायालय द्वारा 13 फ़रवरी को दिए गए निर्णय में 21 राज्यों से लगभग 10 लाख वन निवासियों को वन क्षेत्र छोड़ने का आदेश दिया गया था. उक्त लेख में हम इसके बारे में विश्लेषण करेंगे| इस आदेश का सबसे दुःखद पहलु ये है कि कहीं भी सरकार आदिवासिओं के पक्ष में लड़ती नहीं दिखती और उच्चतम न्यायालय का ये फैसला वनाधिकार कानून – 2006 के बिल्कुल उलट है| सरक़ार सिर्फ निष्क्रिय नहीं रही बल्कि 4 सुनवाई के मौकों पर कुछ नहीं बोली| अंतिम सुनवाई के दिन बोलना तो दूर, सरकार के वकील न्यायालय में उपस्थिति होने की जरुरत ही नहीं समझे| वनाधिकार कानून – 2006 कहता है की जो अनुसूचित जनजाति और दूसरे पारम्परिक वन निवासी काफी सालों से इन जंगलों में रह रहे हैं उन्हें जमीनी अधिकार और खेती की अनुमति देना, जिन्हें की अभी तक अधिकार नहीं दिया गया है| उच्चतम न्यायालय के आदेश से पहले ये केस पिछले 10 सालों तक अलग-अलग बेंचों में घूमती रही थी और अब जाकर अंतिम फैसला आया है| स्क्रॉल के रिपोर्ट के अनुसार, अब तक आदिवासियों और अन्य वन निवासियों द्वारा 41 लाख पट्टा का दावा किया गया और उसमें से 18 लाख को पट्टा दिया गया, 3 लाख प्रक्रिया में है और बाकि 20 लाख को ख़ारिज किया गया है| इन 20 लाख पट्टों का दावा करने वाले सभी लगभग 16 लाख आदिवासियों को जंगल खाली करने का आदेश उच्चतम न्यायालय ने 21 राज्य सरकारों को दे दिया है| मीडिया विजिल ने बताया है की 21 राज्यों के लगभग 13, 86, 549 पट्टों के दावे ख़ारिज कर दिए गए हैं| वही न्यूज़ 18 के अनुसार लगभग 23 लाख लोगों को जंगल के इलाके खाली करने पड़ेंगे|

(फोटो : गणेश मांझी)

अभी के समय में जहाँ-जहाँ जंगल है वहां-वहां आदिवासी हैं| इससे साफ़ जाहिर होता है की आदिवासियों का जीवन जंगलों, पहाड़ों, नदियों से अन्योन्याश्रिता का है| आदिवासी का प्रकृति के इस सम्बन्ध को कोई लाख नकार ले, लेकिन हकीकत यही है की आदिवासी ने जंगल बचाया है और अगर वो जंगल नहीं बचाएगा तो उसका जिन्दा रहना मुश्किल है|

चित्र 1: पट्टे की दावेदारी ख़ारिज

स्रोत: उच्चतम न्यायालय के आदेश से, बार एंड बेंच.

झारखण्ड के कई इलाकों में, गांव वाले ‘मोहरी’ की व्यवस्था करते हैं| इसे हमने बचपन से ही खुद अपनी आँखों से देखते रहे हैं| ‘मोहरी’ व्यवस्था के अंतर्गत गांव वाले जंगल की सुरक्षा के लिए अपने काम का वितरण करते हैं और हरेक दिन एक व्यक्ति कंधे में एक टांगी रखे दिन भर जंगल की रखवाली करता है| ये सिलसिला रोज ही चलता रहता है और लोग बारी-बारी से सप्ताह के अलग-अलग दिन जंगल बचाने की जिम्मेवारी निभाते हैं| मुझे लगता है ऐसी व्यवस्था दूसरे राज्यों में भी जरूर होगी| मुझे लगता है, गांव वालों को इस पारम्परिक जंगल रखवाली की व्यवस्था को और दुरुस्त करना चाहिए| 1983 में हिमाचल प्रदेश का चिपको आंदोलन तो जंगल बचाओ आंदोलनों में सबसे बेहतरीन है|

मध्य और मध्य पूर्वी भारत के इन इलाकों में फारेस्ट रेंजरों के आने से पारम्परिक रूप से जंगल के इलाकों में रहने वाले आदिवासियों का जीवन काफी मुश्किल होता रहा है| फारेस्ट रेंजरों की मन मर्जी का विरोध करने पर काफी बार माओइस्ट होने का आरोप ग्रामीणों पर लगता रहा है, लेकिन सरकार के बेलगाम रेंजरों द्वारा ग्रामीणों को परेशान करना जारी रहा| दरअसल, अत्यधिक सरकारी नियंत्रण की वजह से जंगल का दोहन भ्रष्टाचारी अधिकारियों के नाक के नीचे होता रहा है और ग्रामीणों के हस्तक्षेप की जब बात आती है तो माओइस्ट होने का आरोप लग जाता है|

उच्चतम न्यायालय के तीन जजों – माननीय अरुण मिश्रा, माननीय नवीन सिन्हा और माननीया इंदिरा बनर्जी की खंडपीठ ने, न सिर्फ जंगल के इलाकों में रह रहे और जिनके पट्टे ख़ारिज हो गए हैं उन्हें घर खाली करने के आदेश दिए बल्कि ये भी सवाल किया कि जिनके पट्टे ख़ारिज हो चुके हैं उन्हें अब तक खाली क्यों नहीं कराया गया है| इस मामले में राज्यों को कार्रवाई करने के आदेश सख्त तौर पर दिए गए हैं और इसके लिए अंतिम समय 27 जुलाई 2019 तय किये गए हैं| हरेक राज्य की वस्तुस्थिति को प्रस्तुत करते हुए अंतिम लाइन माननीय उच्चतम न्यायालय लिखता है कि – अगर दिए गए समय में जंगल इलाके नहीं खाली कराये जाते हैं तो इसे न्यायालय गंभीर रूप से लेगा| कम से कम 13,86,549 आदिवासियों को उनके घर से बेदखल करने का फरमान एक नरसंहार से कम नहीं है| अगर जिस जमीन पर जो परिवार ने दावा किया है उस परिवार का औसत परिवार का आकार 5 मान लिया जाए (लगभग भारत में औसत परिवार का आकर 4.9 है) तो अनुमानतः 67,94,090 लोग बेघर हो जायेंगे|

वनाधिकार और जमीन से बेदखल समस्या के समाधान की संभावनाएं
जैसा की ब्लूमबर्ग और क्विंट ने बताया है की ऐसी विकट परिस्थिति में राज्य सरकारें क्या कर सकती हैं?

वनाधिकार कानून ये नहीं कहता है की आदिवासी, अन्य पारम्परिक वन निवासियों को जंगल से नहीं निकाला जा सकता है, बल्कि ये कहता है की उस व्यक्ति को उस जंगल इलाके में कम-से-कम 3 पीढ़ी (1 पीढ़ी = 25 साल ) तक रहने का सबूत देना होगा| ज्यादातर केस में सबूत न होने के बहाने से अधिकारियों द्वारा पूरी जमीन को नहीं माना जाता और केवल जमीन के कुछ भाग का दावा ही माना जाता है| ऐसा हो सकता है कि जंगल के इलाके को अन्य आदिवासियों द्वारा अतिक्रमण करने की कोशिश की गयी हो और वहां पट्टा लेने को कोशिश हो रही हो, ऐसी परिस्थिति में माननीय उच्चतम न्यायालय का आदेश महत्वपूर्ण हो जाता है| यत्र-तत्र विभिन्न विकास कार्यों या डैम निर्माण के क्रम में विस्थापित हुए आदिवासी पुनः जंगल के इलाके में नए सिरे से बसने की कोशिश कर रहे हों इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता है| ऐसे समय में सरकार और न्यायालय के लिए ईमानदारी से निर्णय लेना बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है| फिलहाल वस्तुस्थिति आदिवासियों और अन्य पारम्परिक जंगल निवासियों के ख़िलाफ़ जान पड़ती है| कहीं-कहीं पर उत्खनन और डैम बनने की सम्भावना वाले जगहों पर पट्टे की दावेदारी वाली सारी कागजातें समुचित रूप से बिना जांचे ही दावा ख़ारिज कर दिया गया है| ऐसे परिस्थिति में सरकार उत्खनन कंपनी की ज्यादा और जनता की सेवक कम नजर आतीं हैं|

प्रथम स्तर पर पट्टा के दावेदारी खारिज होने के बाद दावा करने वाला व्यक्ति सब-डिवीजन या जिला स्तर की कमिटी में आवेदन दे सकता है और ऐसी परिस्थिति में न्याय प्रक्रिया, जंगल के इलाके खाली करने का आदेश, दावा करने वालों के अन्य वैकल्पिक सुविधाओं से विमुख नहीं कर सकती है| साथ ही जैसे की न्यायालय द्वारा जवाब माँगा गया है, राज्य सरकारें अपने पेटिशन अपील में पुनर्समीक्षा की बात आसानी से कर सकती हैं|

जिस प्रकार केंद्र की सरकार ने अगड़ी (सवर्ण) जाति के 10 प्रतिशत आरक्षण के लिए त्वरित अध्यादेश लायी उसी प्रकार उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय के विकल्प के तौर पर सरकार अध्यादेश ला सकती है जिससे की आदिवसियों और अन्य पारम्परिक वन निवासियों का वनाधिकार बना रहे|

ये बात बहुत ही महत्वपूर्ण है की सरकारें आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा करती है, या फिर गैर-आदिवासियों को पट्टे देकर जंगल के इलाकों में बसाना जिससे की आने वाले समय में वोटों की बढ़िया खेती हों| इसलिए, कितने पीढ़ी से कोई उस जंगल वाले इलाके में रह रहा है उसकी ईमानदारी से जाँच के बाद पट्टा मिलना बहुत ही महत्वपूर्ण है| वास्तव में, ब्रिटिश काल में भी गैर आदिवासियों को आदिवासी क्षेत्रों में बसाया गया ताकि, तथाकथित मुख्यधारा में सम्माहित (assimilation) और वन संसाधनों का दोहन की प्रक्रिया चलती रहे|

(फोटो : गणेश मांझी)

 

अक्सर जनजाति मंत्रालय आदिवासी अधिकारों को लेकर पर्यावरण, वन मंत्रालय के आगे बौने ही साबित हुए हैं और मुख्यतः पर्यावरण मंत्रालय तभी चर्चे में आती हैं जब किसी कंपनी को उत्खनन का प्रमाण पत्र देना होता है, और कुल मिलाकर जनजाति मंत्रालय मूकदर्शक दंतविहीन ही रहती है| ऐसी परिस्थिति में जनजाति मंत्रालय ज्यादा प्रभावपूर्ण और रणनीति से काम करने और आदिवासियों को अधिकार दिलाने के लिए अगर काम करे तो आदिवासियों को काफी बल मिलेगा|

जैसा की विभिन्न राज्यों में देखने को मिल रहा है की कोई भी राज्य, वनाधिकार कानून को पूरी इच्छा से लागू करती नहीं दिख रही, उच्चतम न्यायालय को अपने फैसले सुनाने से पहले ये अवलोकन जरूर करना था की वनाधिकार कानून कितना लागू हुआ है| वनाधिकार कानून के अवलोकन के बाद निष्कर्ष निकालना बेहतर हो सकता था| वनाधिकार के 10 साल (2006 – 2016) की समीक्षा करते हुए 2016 की एक रिपोर्ट कहती है कि लगभग 856 लाख एकड़ (उत्तर पूर्व और जम्मू कश्मीर को छोड़कर) जंगल का इलाका और लगभग 20 करोड़ अनुसूचित जनजाति और अन्य पारम्परिक वन निवासी जो की लगभग 170000 गांवों में रहते हैं जिनको वनाधिकार कानून के तहत चिन्हित करने का अनुमान था, लेकिन सिर्फ लगभग 3% ही चिन्हित किया जा सका|

जैसा की रांची जैसे शहरों में आदिवासियों की जमीन पर रातों-रात अतिक्रमण कर बड़ी दीवार खड़ी कर दी जाती है, जब तक आदिवासी समझ पाता है देर हो जाती है, ऊपर से कोर्ट कचहरी, और पैसे की कमी — ये सारी चीजें जमीन खोने के लिए पर्याप्त हैं| इसकी अत्यधिक संभावना है कि कहीं वनाधिकार कानून मिलने से पहले ही जंगल के इलाके खाली न करा लिए जाएँ! जैसा कि बस्तर में हो रही हिंसा से बेघर हुए आदिवासी लाखों की संख्या में IDP (Internally displaced people) बन चुके हैं और वन अधिकार कानून उन तक कभी पहुँच भी न पाया।

अभी तक तो केंद्र की सरकार शांत बैठी नजर आ रही है अन्ततः चुनाव से पहले मसीहा की तरह अवतरित हो सकती हैं, जैसे की सत्ताधारी के कुछ दिग्गज नेताओं ने पेटिशन फाइल करने को कहा है| दूसरी ओर, राज सरकारें उच्चतम न्यायालय से समीक्षा के लिए और अधिक समय मांग सकती हैं और आने वाले समय में जब बेंच बदल जायेंगे तो वस्तु स्थिति बदल जाएँगी, और सबसे बुरी स्थिति में ये हो सकता है की सरकार अध्यादेश लाकर सारे समस्या ख़त्म कर दें| वैसे केंद्र सरकार को अध्यादेश लाने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाने की जरुरत है|
गुजरात महाराष्ट्र में जंगल वाले जमीन के पट्टे की दावेदारी के लिए जिस जमीन की दावेदारी की जा रही है उसकी उपग्रह वाले चित्र (satellite image) की मांग की गयी थी और जिसकी वजह से बहुत सारी दावेदारी खारिज की गयी| जो आदिवासी समुदाय अब तक वित्तीय बाजार और तकनीकी की दुनिया से शायद ही ढंग से जुड़े हों उन लोगों से उपग्रह चित्र की अपेक्षा करना कतई भी ईमानदार मानसिकता नहीं लगती है|

वनाधिकार कानून के ख़िलाफ़ पेटिशन फाइल करने वाले उद्योगों द्वारा पोषित ‘वाइल्ड लाइफ फर्स्ट’ और दूसरे एनजीओ को सभ्यता का विकास और आदिवासी जीवन की जानकारी का आभाव लगता है| उनको इतनी समझ रखनी चाहिए की आदिवासियों को जंगल इलाके वाले उनके घर से बेदखल करना फैशन नहीं है बल्कि नरसंहार है| वास्तव में इनका टारगेट जंगल के इलाकों में उद्योगपतियों को खनन के लिए जमीन देने के खिलाफ लड़ना चाहिए जो की जंगल के जीवन और आदिवासी जीवन को बुरी तरह से प्रभावित कर रहे हैं|

भविष्य की अनिश्चितताएं
27 फरवरी को सरकार के आवेदन पर विचार करते हुए उच्चतम न्यायालय के जस्टिस अरुण मिश्रा, नवीन सिन्हा और एम. आर. शाह की खंडपीठ ने फिलहाल के लिए जंगल के इलाके खाली करने के 13 फ़रवरी के फैसले को स्थगित कर दिया है| लेकिन, जस्टिस अरुण मिश्रा की अगुवाई में खंडपीठ ने कहा की ‘शक्तिशाली और अयोग्य’ लोगों पर किसी भी प्रकार की कोई दया नहीं दिखाई जायेगी|
खंडपीठ ने ये भी स्वीकार किया की ग्राम सभा वनाधिकार कानून लागू करने में ग्राम सभा को समुचित अधिकार और समय दिया गया या नहीं| साथ ही, उच्चतम न्यायालय ने राज्य सरकार से 4 महीने में जवाब/जानकारी माँगा है कि — वनाधिकार के तहत पट्टा अत्यधिक ख़ारिज किया गया है, ख़ारिज की सूचना प्रेषित नहीं किया गया, राज्य स्तरीय मॉनिटरिंग कमिटी की अनियमित बैठक, जिला स्तरीय प्रशासन द्वारा जंगल वाले नक्से की तस्वीर उपलब्ध कराने में सहयोग नहीं करना, अपूर्ण आवेदन होने के बावजूद पट्टे की दावेदारी ख़ारिज करना इत्यादि शामिल हैं| सरकार के तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा की – आदिवासी काफी तादाद में अशिक्षित और गरीब हैं और जंगल वाले इलाकों से घर खाली करने पर बहुत सारे परिवारों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा|

जस्टिस मिश्रा ने जोर देकर कहा की जंगल इलाकों पर अतिक्रमण बहुत ही खतरनाक है, और क्या सारे ख़ारिज केस आदिवासियों से सम्बंधित हैं या कुछ गैर आदिवासी भी अतिक्रमण करने की कोशिश कर रहे थे ये जानना बहुत ही महत्वपूर्ण होगा| जस्टिस शाह ने कहा की जंगल पर अतिक्रमण बहुत ही गंभीर मुद्दा है, लेकिन इसके जवाब में जस्टिस मेहता ने कहा की — आदिवासी और प्रकृति एक साथ ही निवास करती है| ज्ञात हो कि आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति के रूप में चिन्हित करने का एक खास मानदंड है — उस समुदाय का प्रकृति के साथ सम्बन्ध|

वैसे देखा जाये तो गैर आदिवासियों द्वारा धार्मिक स्थल के नाम पर आदिवासी क्षेत्रों, और, जंगल-पहाड़ी क्षेत्रों में बेलगाम अतिक्रमण हुआ है, अगर इन सबपर कुछ बंदिश की गुंजाईश बने तो सरकार को जरूर सोचना चाहिए, क्यूँकि आदिवासियों के लिए प्रकृति ही ईश्वर है जो शाश्वत और साक्षात् है| अंततः, मेरी समझ से आदिवासी, मानवता को बचाने के लिए अंतिम बीमा नीति की तरह काम कर रहे हैं और भविष्य में होने वाले प्राकृतिक आपदाओं, ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन जैसी स्थितियों में भी जिन्दा रहने के ज्ञान से वाकिफ हैं| आदिवासियों के साथ बीमा प्रीमियम भरने जैसे खड़े रहें और जिन्दा रहने में सहयोग करें|

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Ganesh Manjhi is a native of Simdega, Jharkhand. Currently he's a PhD scholar at Jawaharlal Nehru University. He is currently working as Assistant Professor (Economics) in Gargi College, Delhi University. गणेश मांझी, सिमडेगा, झारखण्ड से हैं और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में PhD शोधार्थी हैं. साथ ही अभी गार्गी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर(अर्थशास्त्र) के रूप में कार्यरत हैं. Email: gmanjhidse@gmail.com

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