अकेला हूँ

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अकेला हूँ 

मेला और हाट बाजार

भरे लोगों के बीच

मैं बहुत अनाथ महसूस करता हूँ

हूँ सही में अकेला में।

गांव भर और परिवार में

लोग रहने पर भी

वक्त नहीं है लोगों का

मुझसे बात करने को।

सुध नहीं लेती है मेरी

कैसे हो दादाजी

उनकी है नहीं जिज्ञासा

कैसे बना था गांव और देश

जाती और समाज

और पेट भरने को   हल।

उम्र की सूर्यास्त के समय

सही में मैं अकेला हूँ

मेरी कोई है नहीं

जिससे अपना दुःख प्रकट करूँ

खुशियाँ बांटू

और बीते हुए कल की

जीवन इतिहास कहूंगा।

इस प्रतियोगिता की युग में

थक गया हूँ मैं

लोगों को अब मेरी जरुरत नहीं

 मैं बिन मधु का छत्ता जैसा

फेंक हुआ फटा कपड़ा जैसा

अब मई हूँ भरे लोगों के बीच

सही में बहुत अकेला।


 

Picture by: Subhendu Sarkar (courtesy – gettyimages)

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Chandramohan Kisku

दक्षिन पूर्व रेलवे में कार्यरत चंद्रमोहन किस्कु की संताली भाषा में एक कविता पुस्तक "मुलुज लांदा" साहित्य अकादेमी दिल्ली से प्रकाशित हो चुकी है। वे संताली से हिंदी, हिंदी से संताली, बांग्ला से संताली में परस्पर अनुवाद करते हैं और अखिल भारतीय संताली लेखक संघ के आजीवन सदस्य हैं।

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